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लेख़ - फ़ीचर्स

मुद्दे ही मुद्दे गूंजते रहे संसद में, कामकाज में आयी गिरावट
भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल के इस्तीफे की मांग, 2 जी स्पैक्ट्रम, तेलंगाना, श्रीलंकाई तमिलों, लोकपाल आंदोलन, महंगाई और मुजफ्फरनगर दंगों समेत विभिन्न मुद्दे सालभर संसद के गलियारों में गूंजते रहे।इस साल दो बार ऐसा हुआ कि हंगामे के कारण संसद के सत्र को निर्धारित समय से कई दिन पहले ही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।संसद का बजट सत्र दस मई की बजाय दो दिन पहले आठ मई को और शीतकालीन सत्र निर्धारित तारीख 20 दिसंबर से दो दिन पहले ही 18 दिसंबर को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना पड़ा।पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के आंकडें बताते हैं कि पांच दिसंबर से शुरू होकर 18 दिसंबर को संपन्न संसद के शीतकालीन सत्र में लोकसभा में 94 फीसदी और राज्यसभा में 81 फीसदी समय हंगामे की भेंट चढ़ गया।बजट सत्र में हंगामे के कारण लोकसभा का 92 घंटे से अधिक का समय और राज्यसभा का भी 82 घंटे से अधिक का समय बर्बाद हुआ था।भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय मंत्रियों अश्विनी कुमार और पवन कुमार बंसल के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच बने गतिरोध के चलते संसद का बजट सत्र निर्धारित समय से दो दिन पूर्व अचानक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था।हंगामे के कारण बजट सत्र के दूसरे चरण का पूरा समय शोर शराबे की भेंट चढ़ कर व्यर्थ चला गया और इस दौरान केवल संवैधानिक रूप से आवश्यक वित्तीय कामकाज ही निपटाया जा सका। हंगामे के कारण 22 अप्रैल से शुरू हुए दूसरे चरण में एक दिन भी प्रश्नकाल नहीं चल सका।बजट सत्र के दो दिन पूर्व ही स्थगित किए जाने से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं किए जा सके। हालांकि बाद में सरकार इन्हें मानसून सत्र के दौरान पारित कराने में सपल रही । हंगामे के कारण इस चरण में लोकसभा का 92 घंटे से अधिक का समय और राज्यसभा का भी 82 घंटे से अधिक समय बर्बाद हुआ।अचानक सदन की बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किये जाने से खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण विधेयक और बांग्लादेश से भूमि सीमा समभौते जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित नहीं कराया जा सका।जो एकमात्र कामकाज हुआ, वह वित्त विधेयक का पारित होना था।इससे बजट प्रक्रिया पूरी हो गयी।रेल बजट भी पारित हुआ लेकिन वित्त विधेयक और रेल बजट को बिना चर्चा के ही पारित कराना पडा और इस दौरान विपक्ष ने वाकआउट किया ।तीन महीने चलने वाले बजट सत्र की शुरूआत 21 परवरी को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा लोकसभा और राज्यसभा के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित किए जाने से हुई थी।22 मार्च को मध्यावधि अवकाश पर जाने से पूर्व संसद में आपराधिक कानून :संशोधन: विधेयक और राष्ट्रपति के अभिभाषण पर पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर सारगर्भित चर्चा हुई।संसद ने दिल्ली में एक युवती के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार की जघन्य घटना की एक स्वर में निंदा की और एक कड़ा कानून पारित किया।सदस्यों ने संसद पर हमला मामले के दोषी अफजल गुरू को पांसी दिए जाने की निंदा करने वाले पाकिस्तान की नेशनल असेम्बली द्वारा पारित प्रस्ताव को भी एकजुट होकर अस्वीकार किया।संसद ने सर्वसम्मति से पाकिस्तान से भारत के अंदरूनी मामलों से दूर रहने और चरमपंथी गतिविधियों तथा आतंकवादी तत्वों को समर्थन से परहेज करने को कहा। संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन ने खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण संबंधी ऐतिहासिक विधेयकों को पारित करने के साथ ही पेंशन विधेयक, लोक प्रतिनिधित्व संशोधन विधिमान्यकरण विधेयक और राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय विधेयक को भी मंजूरी प्रदान की। एक महीना लंबा लोकसभा का यह मानसून सत्र पांच अगस्त से शुरू हुआ था और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक सदन की बैठक 30 अगस्त तक चलनी थी लेकिन बाद में इसे एक सप्ताह बढाकर छह सितंबर तक कर दिया गया था।शीतकालीन सत्र में भी बजट सत्र के दूसरे चरण की कहानी दोहरायी गयी।संसद के दोनों सदनों की बैठकें निर्धारित तारीख से पहले ही 18 दिसंबर को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गयी।पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 5 दिसंबर को शुरू हुआ संसद का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक चलना था।शुरूआत से ही हंगामे के कारण दोनों सदनों में एक भी दिन प्रश्नकाल नहीं हो सका।उपलब्धियों की बात करें तो विधायी कामकाज के तहत संसद ने केवल एक महत्वपूर्ण विधेयक लोकपाल एवं लोकायुक्त विधेयर्कं को पारित किया।इस बीच संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ ने संकेत दिया कि आम चुनाव से पहले नये साल में बजट सत्र की बजाय लेखा अनुदान पारित कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें अल्पकालिक नोटिस पर पिर बुलाई जा सकती हैं।
सो:(भाषा)


  कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है यह जनादेश .......


"मैदान ऐ ज़ंग में होती है जीत और हार
पर सिकंदर वही होता है जिसे मिले जनता का प्यार"

किसी शायर द्वारा कही गई उपर की यह पंक्तियाँ अनायास ही हमारे जेहन में आ रही है  हालाँकि देश के पांच राज्यों का चुनाव निपट चुका है लेकिन इन चुनावो के परिणाम ने दिखा दिया है कि  हार जीत तो चुनाव के साथ लगे ही रहते है, लेकिन असली सिकंदर वही बन पता है जिसको जनता का दुलार मिलता है..........

दिल्ली , राजस्थान, मध्य  प्रदेश , छत्तीसगढ़ मिजोरम के चुनावो के परिणाम  सामने आ चुके है....  मप्र , छत्तीसगढ़ का पुराना किला जहाँ बीजेपी ने बचा लिया वही दूसरी तरफ  शीला "दीदी" की  पार्टी   दिल्ली  के साथ ही राजस्थान में धराशायी हो गई है ।  मिजोरम  कांग्रेस  की लाज बचा  पाने में सफल हुआ है जहाँ लालथनहावला फिर से सरकार  में सफल हुए हैं  परन्तु  मिजोरम को अगर छोड़  दें तो  चार राज्यो की 7 2   लोक सभा की सीटें  बहती हवा के रुख का सही से अहसास करा  सकती है ।अगर इसके संकेतो को डिकोड  करें तो माहौल  पूरी तरह कांग्रेस विरोधी दिखायी देता है  जिसके चलते आने वाले लोक सभा चुनावो में पार्टी की  मुश्किलें  बढ़ सकती हैं ।



आठ  दिसम्बर का लोग बड़ी जोर शोर से इंतजार किए हुए थे । कारण था यह चुनाव 2 01 4  के लोक सभा चुनावो की नब्ज टटोलने का जरिए बनेगा शायद  तभी  मीडिया में जोर शोर से चुनावो की कवरेज दी जा रही थी  और वह  इसे संसद का सेमीफाइनल करार दे रहे थे ।  मसला इतना रोचक बन गया क़ि  देश का दिल कही जाने वाली हमारी"दिल्ली" के बैरोमीटर से सभी दल लोक सभा चुनावो से पहले अपने सियासी सूरते हाल नापने में लगे थे  लेकिन जब ८ दिसम्बर को वोटिंग मशीनो का पिटारा खुला तो राजनीती के अच्छे अच्छे पंडितो के होश उड़ गए  ।  मिजोरम को छोड़ दे तो चुनावो में बीजेपी कांग्रेस पर पूरी  तय तरह भारी  पड़ी । दिल्ली में "आप" सरीखी  एक नई नवेली पार्टी ने एंटी कांग्रेस  माहौल का लाभ लेते हुए 2 8  सीटें  झटकते हुए भाजपा और  कांग्रेस के कई बड़े दिग्गजों को पानी पिला दिया ।

पांच राज्यो का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक  रहा  ।  चुनावो में "सत्ता विरोधी" लहर की आंधी दिल्ली और राजस्थान को उडा  ले गई तो वहीँ इसका बहुत आंशिक असर मप्र , छत्तीसगढ़ में देखने को मिला । शिवराज और रमन सिंह ने अपने विकास के बूते यह साबित किया अगर आप अच्छा काम करते हैं तो जनता उसका फल दुबारा वापसी करवाकर देती है ।

 दरअसल इन  राज्यो  के चुनावो में जनता ने स्थानीय समस्याओ , विकास को तरजीह दी...... महंगाई, भ्रष्टाचार का पूरा ठीकरा केंद्र सरकार के सर फूटा ।  केंद्र की यू  पी ए सरकार ने अपने कार्यकाल में जिस तरह महंगाई का बोझ आम आदमी के कंधो पर डाला और जिस तरीके से उसके शासन में घोटालो की बाढ़ आयी उसने पहली बार कांग्रेस की चिंताओ को बढ़ाने का काम किया शायद यही वजह थी चुनाव परिणामो के आने के चन्द  घंटे  बाद राहुल सोनिया  को साथ लेकर कांग्रेस मुख्यालय के सामने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते दिखायी दिए । बीजेपी , कांग्रेस इन चुनाव परिणामो पर नज़र लगाये थी... जहाँ कांग्रेस को यह आस थी  वह अपने मनमोहन के "मनमोहक"कार्यक्रमों की बदौलत  राज्यों के इक बड़े वोटरों के तबके तो लुभाने में कामयाब होगी वहीँ बीजेपी को अपने शासन वाले राज्यों में जीत आस तो थी , साथ में उसको दिल्ली में इस दफा कमल का फूल खिलने की भी  आस थी लेकिन  कांग्रेस चुनावी बैरोमीटर के दाब को परखने में गलती हो  गई....   मिजोरम  तो बच गया  पर राजस्थान , मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसका सूपड़ा साफ़ हो गया ।

 इन राज्यों के विधान सभा चुनावो के परिणामो को प्रेक्षक अलग अलग नज़र से देख रहे है लेकिन वह भी  इस नतीजे पर पहुंचे हैं यह जनादेश पूरी तरह से कांग्रेस विरोधी रहा है । इस बार के मतदान का रुख पिछले बार से बिल्कुल अलग नज़र आता है।  पिछली बार के चुनावो में यह देखा गया सत्ता विरोधी लहर परिणामो को प्रभावित करती नज़र  आती थी जो सत्तारुद दल का जहाज गंतव्य स्थान तक ले जाने में बड़ा रोड़ा खड़ा करती थी लेकिन इस चुनाव में यह फैक्टर चारों खाने चित  हो गया है.... मप्र  छतीसगढ़ में जीत का सेहरा  शिव , रमन के सर बधा  है तो राजस्थान में वसुंधरा राजे ने फिर अपनी छमताओं  को बखूबी साबित कर दिखाया है  जहाँ दो तिहाई बहुमत से भाजपा  की राजस्थान में सरकार बनी है ।

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इस चुनाव के बाद कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग यह प्रचारित करने में लगा है कि वोटरों का विश्वास उसकी नीतियों में बना हुआ है....  लेकिन राज्यों के चुनाव में अब स्थानीय  मुद्दो के साथ राष्ट्रीय मुद्दे भी  जोर पकड़ने लगे है ।  ऐसे में जीत वही हासिल रहा है जो इनको जोर शोर से उठा रहा है ।  कम से कम राज्यों का वोटर अब यह समझ रहा है कौन सरकार अच्छी है? किसको वोट देना चाहिए...दिल्ली में आप का साथ देकर वोटर ने पहली बार एक नयी इबारत लिखने की कोशिश की है जिसकेआने वाले दिनों में गम्भीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं ।  खुदा - ना ख़ास्ता  यह दिल्ली के यह चुनाव परिणाम देश को वैकल्पिक राजनीती कि दिशा में मजबूती का साथ ना ले जाएँ |

दिल्ली में चौथी  बार शीला जी का जलवा चल नहीं पाया । वह खुद अरविन्द  केजरीवाल के हाथो बुरी तरह पराजित हुई ।  इस हार ने  कांग्रेस का उत्साह ठंडा कर दिया । .बीजेपी को  दिल्ली से इस बार सबसे ज्यादा आस थी  लेकिन कांग्रेस के किले में "आप" ने सबसे बड़ी सेंध लगाकर भाजपा को बहुमत से दूर ले जाने में अहम भूमिका निभायी ।

शीला जी का जादू  इस दिल्ली में नहीं चल पाया । बेशक शीला ने  बीते पंद्रह बरस से वहां पर विकास कार्यो की जड़ी लगा दी थी लेकिन इन 1 5  वर्षो में अपराधो का बढ़ना , महिलाओ का असुरक्षित  होना, कामनवेल्थ , २जी , कोलगेट  जैसे कई मुद्दे उनके विरोध में गए । दो साल पहले जंतर मंतर पर जनलोकपाल को लेकर जिस तरह प्रदर्शन हुए उसने शीला सरकार कि परेशानियो को बढ़ाने का काम ही  किया । रही सही कसर बिजली और पानी की  बढ़ी हुई कीमतो ने बढ़ा दी जिससे आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान था । अब  शीला  असफलता के लिए लोग क्रेडिट मनमोहन और सोनिया को दे रहे है जो सही नही है ... कांग्रेस को इन चुनावो से सबक लेने की जरुरत है... उसके साथ  एक बड़ी बीमारी यह लगी है वह स्थानीय नेताओ को पनपने नही देती ... बेहतर  होता इस चुनाव में कांग्रेस शीला के बजाए  किसी नए चेहरे पर दाव  लगाती।  वैसे  दिल्ली में सरकार और संगठन में शुरू से तनातनी  ही  रही । शीला  और जय प्रकाश अग्रवाल के बीच छत्तीस  के आंकड़े  ने सरकार  के सामने कई बार परिस्थितिया  असहज ही  बनायी ।  वहीँ  दिल्ली में बीजेपी की सबसे बड़ी भूल यह हो गई हर्षवर्धन  का नाम उसने सीएम के रूप में डिक्लेयर करने में देरी कर दी  ।

पिछले चुनाव में जहाँ विजय कुमार  मल्होत्रा शीला के आगे कही नही  ठहरे तो वह इस बार डॉ  हर्षवर्धन की साफ़ सुधरी  छवि के साथ भाजपा चुनावो में गयी  जिसमे बहुत हद तक उसको लाभ हुआ लेकिन फिर भी बहुमत से वह दूर ही रही ।

 दिल्ली में भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा इस दौर में  नहीं है जो विपक्षियो पर भारी पड़ता । साठ  के दशक तो याद करें तो  उस समय दिल्ली में "पंजाबी और वैश्य " बिरादरी का सेंसेक्स सातवे आसमां पर चढ़ा करता था लेकिन आज इसमे ग्लोबल मेल्टडाउन आ चुका है  ।  दिल्ली का हाल आज ऐसा है यहाँ पर बिहारी, उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड और अन्य राज्यो  के प्रवासियों की संख्या में  भारी इजाफा हो गया है ।  कांग्रेस इसको १९९८ में समझ गई जब उसने उत्तर प्रदेश  मूल की शीला दीक्षित  को  दिल्ली में पटक दिया ... शीला ने कमान लेकर परंपरागत वोट बैंक पर तो मजबूत पकड़ बनायी  साथ में प्रवासियों  की  सारी बिरादरी  को साथ भी ले लिया ... बेचारी बीजेपी  अभी  तक इस बात को नहीं समझ रही है शायद यही वजह है भाजपा में   विजय गोयल,  विजय मल्होत्रा , विजय जौली,  जगदीश मुखी  और अब हर्षवर्धन जैसे  नेताओ के साथ प्रयोग करने का दौर ही चल रहा है ।


 मप्र  तो शिव लहर पर फिर से सवार हो गया .... मध्य प्रदेश में कांग्रेस चारो खाने चित  हो गयी और शिव राज हैट्रिक लगाने में सफल हुए ।  नमो  की तर्ज पर कई विधायको का टिकट काटने का साहस उन्होंने दिखाया... जिसमे शिव पास हो गए..... शिव को उनके नेक कामो और योजनाओ  का मेवा मिला । कांग्रेस की तो  हवा फुस्स हो गई .... । सबसे बड़ी गलती  कांग्रेस की यह हुई उसने केंद्रीय मंत्री हरीश रावत को प्रदेश का प्रभारी बना कर भेजा । हरीश रावत खुद उत्तराखंड में सियासी गुटबाजी को बढ़ाते आये हैं । मध्य प्रदेश जाकर उन्होंने कांग्रेस की गुटबाजी को और हवा देने का काम किया ।  ज्योतिरादित्य, दिग्गी राजा, कमलनाथ, सुरेश पचौरी,अजय सिंह  सबकी गुटबाजी उसे ले डूबी ।  हार के कारणों पर राहुल बाबा पोस्टमार्टम  कब  शुरू  करें यह दूर  की गोटी है लेकिन कांग्रेस अपने घर में ही घिर कर रह गई  .... शिव तो चुनावो की तिथि घोषित होने से पहले से  दो तिहाई मप्र  घूम चुके थे...

जनसंदेश यात्रा के आसरे शिवराज ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया और शिव की सादगी शिवराज के भ्रष्ट  मंत्रियो पर भारी पड़ी । साथ ही शिवराज की योजनाओ और नमो की  रैलियो ने भाजपा के पक्ष में हवा बनायी ।

छत्तीसगढ़ में  चावल वाले " रमनबाबा जी " का जलवा फिर से चल गया .. जोगी की कांग्रेस इस  ज़ंग में हार गई ... नक्सली हमले में कांग्रेस के कई नेता मारे गए पर उस सहानुभूति का लाभ वह नहीं ले सकी । बस्तर में जरुर उसने अपनी सीटो की संख्या में इजाफा किया लेकिन  रमन सिंह ने 4 9  सीटें जितवाकर उसके सपनो को ध्वस्त  ही कर दिया ।  रमन की साफ  सुधरी छवि  का मतदाताओ  पर अच्छा असर हुआ.... कांग्रेस की वहां पर हार होने से अब  अजित जोगी  का वनवास अब तय है । वैसे भी शायद दस जनपथ ने जोगी को इस बार चुनाव प्रचार से दूर ही  रखा ।

वहीँ राजस्थान में अशोक गहलोत  की रियासत नही बच सकी..... गहलोत की हार में बहुत हद तक केन्द्र सरकार की महंगाई और भ्रष्टाचार ने भूमिका निभायी । रही सही कसर  उनकी सरकार की विफलताओ ने पूरी कर दी । चुनावी बेला पास आते देख गहलोत ने राजस्थान में ताबड़तोड़  योजनाओ की शुरुवात  की और इसी दौर में बड़े बड़े लोकार्पण भी शुरू हुए । लेकिन विकास के हर मोर्चे पर भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था की लचर व्यवस्था ने उनके शासन की पोल खोल दी । यही नहीं अपने रिश्तेदारो को जिस तरह उन्होंने खनन के पट्टे  बाटे और यह मामला विधान सभा में भी गूंजा उससे उनकी खासी किरकिरी  हुई । रही सही कसर  भवरी -मदेरणा और बाबूलाल की रास लीलाओ ने पूरी कर दी जिसकी आम जनता में खासी  छीछलेदारी हुई ।


वही मिजोरम में सत्ता विरोधी लहर की आंधी नहीं चल सकी ...कांग्रेस  ने  पूरा दो तिहाई बहुमत फिर से पा लिया । मिजो नेशनल फ्रंट की सत्ता में वापसी की कोशिशे रंग नहीं ला सकी ।  लालथनहावला  के सामने एक बार फिर  बड़ी चुनौती जन आकांशा को पूरा करने की है । देखना होगा प्रदेश के विकास के लिए इस बार वह क्या प्रयास करते दिखाए देंगे ?

बहरहाल पांच राज्यो  के चुनावो के बाद लोकसभा का आंकलन करना बड़ी भारी भूल होगी लेकिन बहती हवा यह अहसास  तो करा ही रही है कांग्रेस लगातार सिकुड़ रही है औरअगर यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में लोकसभा चुनाव में सौ सीटें  जीत पाना उसके लिए मुश्किल होगा ।  पांच राज्यो के परिणामो  के बाद अब मतदाताओ  की"रिवर्स स्विंग" ने उसको  " बेक फ़ुट ड्राइव" में लाकर खड़ा कर दिया है...अब उसे  नई रणनीति पर काम करना होगा । " नमो " की तर्ज पर उसे किसी चेहरे के साथ लोक सभा चुनाव में आगे जाना ही होगा । वैसे भी चुनाव की उलटी गिनती इस साल के बीतने के साथ शुरू हो जायेगी । ऐसे में किसी ख़ास रणनीति पर दस जनपथ को काम करना ही होगा और गांधी परिवार को अब बदलती परिस्थितियो के अनुकूल अपने को मथना पड़ेगा क्युकि पहली बार गांधी  परिवार  का "औरा " नमो" के आगे फीका पड़ता दिखायी दे रहा है । रही सही कसर मनमोहनी इकोनोमिक्स ने पूरी कर डाली है जहाँ आम आदमी की थाली दिन पर दिन महंगी होती जा रही है और भ्रष्टाचार ने कांग्रेस की मिटटी पलीत कर डाली है । ऐसे में अब कांग्रेस के वार रूम पॉलिटिक्स  के  कर्ता धर्ताओ को कुछ तो करना ही होगा ?
::-हर्षवर्धन पाण्डे
 एक भरोसो -एक आस - एक विश्वास  अरविन्द केजरीवाल 
जब सारी व्यवस्था ही लूट खसोट की पोषक बन जाए | शासक वर्ग सत्ता की ठसक दिखाते हुए सत्ता के मद में चूर हो जाए और आम आदमी के सरोकार हाशिये पर चले जाए तो ऐसे में रास्ता किस ओर जाए और किया भी क्या जाए "
दिल्ली  के नांगलोई  इलाके से ताल्लुक रखने वाले मंजीत कुमार जब मौजूदा व्यवस्था से थक हार कर आक्रोश में यह जवाब देते हैं तो भारतीय राजनीती के असल स्तर का पता चलता है | कांग्रेस के युवराज के बजाए अब वह राजनीती के नए युवराज केजरीवाल के झाड़ू को साथ लेकर दिल्ली की सडको पर इन दिनों निकल  रहे हैं | देश के हर राजनीतिक दल से उनका मोहभंग हो गया है । उनकी माने तो सत्ता में आने से पहले हर राजनीतिक दल तरह तरह के जतन  करते हैं लेकिन  सत्ता की मलाई चाटते चाटते सभी आम आदमी को हाशिये पर रख देते हैं लेकिन आम आदमी  पार्टी में उन्हें कुछ खास नजर आ रहा है । वह सिस्टम में घुसकर राजनीतिक दलो की  सियासी जमीन को दरकाने चाहते हैं ।

दिल्ली में बिजली की बड़ी हुई कीमतें शीला दीक्षित के लिए आगामी चुनावो के मद्देनजर मुश्किलें जहाँ मुश्किलें खड़ी कर रही हैं वहीँ पहली बार भाजपा सरीखे बड़े दलों की बोलती अरविन्द केजरीवाल की राजनीती ने  इस दौर में बंद कर डाली है जिसके चलते भाजपा के दिल्ली में  प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल भी भाजपा की दिल्ली में बिसात बिछाने में असहज महसूस कर रहे हैं । यही नहीं भाजपा के सी एम पद के चेहरे डॉ हर्षवर्धन के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा भी भाजपा की मुश्किलो को इस चुनाव में बढ़ाने का काम कर रहा है साथ में संगठन के बड़े पदो पर जिस तरह विजय गोयल की वैश्य बिरादरी का सीधा कब्ज़ा है उससे पार्टी में अन्य जातियो का प्रतिनिधित्व कम हो चला है जिसके चलते उनकी नाराजगी अभी भी कम नहीं हुई है ।

  जिस तरीके  से केजरीवाल के समर्थन में दिल्ली में बिजली और पानी की  बड़ी हुई कीमतों के विरोध  में बड़ी जनता सामने आयी है उसने पहली बार राजनीती को एक सौ अस्सी से ज्यादा के कोण पर झुकने को मजबूर कर दिया है ।    सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपने निशाने पर लेने वाले अरविन्द केजरीवाल की इंट्री भारतीय राजनीती में उस “एंग्री यंगमैन “ के तौर पर हो रही है जिसके केंद्र में पहली बार आम आदमी है जो इस दौर में हाशिये पर चला गया है वहीँ अरविन्द आम आदमी के आसरे भारत की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की जड़ो को खदबदाने की कोशिशे कर रहे हैं जिसमे उनको सफलताए भी मिल ही है शायद यही कारण है आम आदमी केजरीवाल में उस करिश्माई युवा तुर्क का अक्स देख रहा है जिसके मन में सिस्टम से लड़ने की चाहत है और वह सिस्टम में घुसकर नेताओ को आइना दिखा रहा है |

दरअसल भारतीय राजनीती इस दौर में सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है | यह पहला मौका है जब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष की साख मिटटी में मिल गई है | एक के बाद एक घोटाले भारतीय लोकतंत्र के लिए कलंक बनते जा रहे हैं लेकिन सरकार को आम आदमी से कुछ लेना देना नहीं है क्युकि उसकी पूरी जोर आजमाईश विदेशी निवेश बढाने और कारपोरेट के आसरे मनमोहनी इकोनोमिक्स की लकीर खीचने में लगी हुई है |

उदारीकरण के बाद इस देश में जिस तेजी से कारपोरेट  के लिए सरकारों ने फलक फावड़े बिछाए हैं उसने उसी तेजी के साथ भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है | इस लूट के खिलाफ समय समय देश में आवाजें उठती रही हैं लेकिन आज तक कोई सकारात्मक पहल इस दौर में नहीं हो पायी है | स्थितिया कितनी बेकाबू हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर मौजूदा दौर में कोई केजरीवाल सरीखा व्यक्ति तत्कालीन कानून मंत्री और वर्तमान विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को उनके संसदीय इलाके फर्रुखाबाद में चुनौती देता है तो माननीय मंत्री उसे खून से रंगने और निपटा देने की बात कहते हैं वहीँ दम्भी प्रवक्ता रहे और वर्तमान में सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी अन्ना को भगौड़ा एक दौर में घोषित कर देते हैं जो आम आदमी का हाथ कांग्रेस के साथ की असल तस्वीर आँखों के सामने लाता है |

 देश में यह पहला मौका रहा है  जब २०११ मे अन्ना की अगस्त क्रांति , रामदेव के जनान्दोलन ने लोगो को इस भ्रष्टाचार के दानव के खिलाफ लड़ने के लिए सड़क पर एकजुट किया और पहली बार राजनेताओ की साख पर सीधे सवाल इसी दौर में ही उठने लगे | दरअसल अपने देश में अब भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या बन चुका है | प्रायः लोग इसको लाइलाज समझने लगते हैं लेकिन अब समय आ गया है जब इससे निजात पाने का विकल्प  लोगो को देना होगा | देश के युवाओ में इसे लेकर गहरा आक्रोश है और वह पहली बार देश के नेताओ से लेकर नौकरशाहों को निशाने पर लेकर उनकी जमीन को निशाने पर ले रहा है और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही हर लड़ाई में अपनी भागीदारी दर्ज कर रहा है | इस लड़ाई में पहली बार वो लोग भी युवाओ के साथ दिख रहे है जो अपने अपने पदों से रिटायर होकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को साकार करने सड़क से संसद तक का रास्ता अख्तियार करने को भी तैयार खड़े हैं |


देश की पैसठ फीसदी युवा आबादी अब आगामी चुनाव में अपनी बिसात के जरिए सत्ता के हठी तंत्र को भोथरा करने में जुटी है जिसमे अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम के साथी टिमटिमाते दिए में रोशनी दिखाते नजर आते हैं | अरब स्प्रिंग से प्रेरित होकर भारत में भी लोग तहरीर चौक की तर्ज पर नया भारत बसाने का सपना अब देखने लगे हैं और शायद उसी का परिणाम था पूरे देश में अन्ना आन्दोलन की परिणति ऐसी हुई जिसने पहली बार लोकतंत्र में लोक के महत्व को साबित कर दिखाया |



 २ जी , आदर्श सोसाईटी , कामनवेल्थ घोटाला ,कर्नाटक की खदान में हुआ घोटाला यह सब ऐसे मुद्दे थे जिसने अन्ना के आन्दोलन को प्लेटफोर्म देने का काम किया | लोगो ने इस जनांदोलन से सीधा जुड़ाव महसूस किया शायद इसी के चलते सभी नए इस पर बढ़ चढकर भागीदारी बीते बरस की | आज अन्ना और अरविन्द की राहें भले ही जुदा हो गई हैं लेकिन दोनों का मुद्दा एक है देश से भ्रष्टाचार का खात्मा और इसी के चलते अब केजरीवाल जहाँ अब सत्ता के मठाधीशो को उनकी माद में घुसकर चुनौती दे रहे हैं वहीँ राजनेताओ को आईना दिखाकर यह भी बतला रहे हैं २०१४ में खुद अकेले ही चलना है और अकेले ही रास्ता भी तैयार करना है मौजूदा माहौल को देखते हुए लगता है  भ्रष्टाचार देश में एक बड़ा मुद्दा आने वाले दिनों में  बन सकता है |

 मौजूदा दौर में भारतीय राजनीती के सामने जैसा संकट खड़ा है वैसा पहले कभी खड़ा नहीं था | इस दौर में जहाँ कांग्रेस की  भ्रष्टाचार के मसले पर खासी किरकिरी हो रही है वहीँ कोयले की कालिक के दाग से लेकर पूर्ति के गडबडझाले पर पहली बार उस विपक्षी पार्टी के पूर्व  राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर सवाल उठे हैं जो पार्टी अपने को पार्टी विथ डिफरेंस कहती नहीं थकती है और संयोग देखिये यही पूर्वराष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली में ही पिच पर उतारकर प्रभारी बन भाजपा की चुनावी संभावनाओ को टटोल रहे हैं ।  आम जनता में यह सन्देश जा रहा है दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में भ्रष्टाचार के मसले पर भी मैच फिक्सिंग है | यह फिक्सिंग राष्ट्रीय स्तर  से लेकर एम सी डी तक में महसूस हो सकती है ।  ऐसे माहौल में केजरीवाल सरीखे लोग अब लोगो को यह विश्वास करा रहे हैं अब भ्रष्टाचारी नेताओ के दिन जल्द ही लदने वाले हैं तो समझा जा सकता है आने वाले दिनों में नई बिसात संसदीय राजनीती में बिछने जा रही है जिसमे जनता के हाथ सत्ता की चाबी सही मायनों में होगी |



न केवल केजरीवाल के साथ बल्कि रामदेव और अन्ना के गैर राजनीतिक आन्दोलन के साथ भी अब जनता खड़ी होती इस दौर में अगर दिख रही है तो इसका बड़ा कारण यह है आम आदमी इस दौर में भ्रष्टाचार से परेशान है | मिसाल के तौर अरविन्द  केजरीवाल को ही लीजिए अन्ना के राजनीतिक विकल्प देने के सवाल पर जब दोनों ने अलग राहें चुनी तो कई लोगो ने सोचा बिना अन्ना के केजरीवाल की राह मुश्किल भरी रहेगी लेकिन जनलोकपाल पर मनमोहन , सोनिया और गडकरी के घेराव , बिजली की बड़ी कीमतों के खिलाफ दिल्ली में विशाल प्रदर्शन द्वारा उन्होंने अपनी असली ताकत का एहसास करा दिया | युवाओ की एक बड़ी टीम उनके साथ हर मसले पर खड़ी रही चाहे वाड्रा का मामला लें या गडकरी का ,हर जगह उनको युवा साथियो का सहयोग इस दौर में मिला है | यही नहीं जब से केजरीवाल ने अम्बानी के साम्राज्य की लूट के खिलाफ मोर्चा खोला  तो मीडिया भी उनको सुर्खिया देना बंद कर दिया । यही वजह है दिल्ली में आम आदमी से जुड़े बिजली पानी के मसले पर उसने आम आदमी पार्टी को जगह देनी बंद कर दी है ।


 आज आलम यह है केजरीवाल के पास भ्रष्टाचार की आये दिन सैकड़ो शिकायते देश भर से आ रही हैं जिन पर वह अपने साथियो के साथ प्रतिदिन बहस करते हैं और युवा साथियो से लैस केजरीवाल ब्रिगेड उस पर गंभीरता के साथ अध्ययन करती है और अब इस बार के दिल्ली चुनावो में यही यंग ब्रिगेड केजरीवाल के आसरे संसदीय राजनीति को न केवल लोकतंत्र का ककहरा चुनाव जीत जाने और पांच साल शासन कर लेने भर से नहीं पढ़ा  रही बल्कि यह भी बता रही है राजनीति विरासत का खेल नहीं  है । इसमें आम आदमी से जुड़े सरोकार भी मायने रखते हैं तो इसे  हम एक अच्छी शुरुवात तो मान ही सकते हैं ।

 दिल्ली में  दिसंबर  में होने जा रहे चुनाव केजरीवाल की पार्टी के लिये अहम हो चले हैं । अगर दिल्ली में पार्टी अच्छा  करती है तो आगामी लोक सभा चुनाव में भारतीय राजनीती एक नयी करवट लेती दिखाई देगी जिसके केंद्र में आम आदमी होगा । अभी लोगो को उम्मीद है कि केजरीवाल की नई पार्टी अन्य पार्टियों से इतर अलग राह पर चलेगी | शीला के करंट के जरिये अरविन्द अब बचे दिनों में दिल्ली  के घर घर तक अपनी पकड़ बना रहे हैं । पिछले  दिनों में उनके साथ रेहड़ी मजदूर और कामगारों के साथ ऑटो चलाने वाले लोगो का एक बड़ा तबका साथ  आया है  जो आम आदमी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण  होने वाला है  क्युकि  इसी वोट बैंक के आसरे केजरीवाल दिल्ली में अपनी बिसात बिछा रहे हैं | हाल के वर्षो में  शीला दीक्षित की मुश्किलें बिजली , पानी की बड़ी कीमतों ने बढ़ाई हुई हैं | ऊपर से सरकार के खिलाफ आम जनमानस में रोष है | हाल के कुछ दिनों में  केजरीवाल ने वहां पर आम सभाए कर जनता से  जुड़े मुद्दे उठाये हैं | जनता बिजली, पानी , महंगाई से कराह रही है ऊपर से भ्रष्टाचार से देश का आम आदमी परेशान  इस दौर में हो चुका है | केजरीवाल इन्ही मुद्दो के आसरे जनता में घर घर पैठ बनाने की कोशिशो में लगे हैं और बिजली और पानी के करंट के जरिये शीला को बैकफुट पर लाया जा सकता है ।


कुछ लोग केजरीवाल की राजनीती को ख़ारिज करने में लगे हुए हैं और उनको आये दिन निशाने पर ले रहे हैं | कांग्रेसी जहाँ सत्ता के मद में चूर होकर केजरीवाल को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं वहीँ भाजपा भी उसी के सुर में सुर मिला रही है जबकि हमारे देश के राजनीतिक दल शायद इस बात को भूल रहे हैं कि मौजूदा दौर में हमारे राजनीतिक सिस्टम में गन्दगी भर गई है | अपराधियों और माफिया प्रवृति के लोग राजनीती की बहती गंगा में डुबकी लगा रहे है | हत्या, चोरी, बलात्कार जैसे संगीन अपराधो में लिप्त लोग लोकतंत्र की शोभा बड़ा रहे है | राजनीती में भाई भतीजावाद, परिवारवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता भरी हुई है और इन सबके बीच अगर केजरीवाल राजनीति का शुद्धिकरण करने अगर आम आदमी पार्टी बनाकर  निकल रहे हैं तो वह कौन सा संगीन अपराध कर रहे हैं जो हमारे देश की बड़ी राजनीतिक जमात उनको ख़ारिज करने पर तुली हुई है | यही नहीं पत्रकारों की एक बड़ी जमात भी अब उनके पार्टी बनाने के फैसले पर साथ नहीं है | हमारे पत्रकारिता जगत के लिए यह शर्म की बात है जो खुलासे केजरीवाल कर रहे हैं उन पर अब तक किसी भी मीडिया घराने ने कई बरस से ना तो कलम ही चलाई और ना ही अपने चैनल में उन पर खबरें दिखाई  | केजरीवाल के यही खुलासे शायद अब इसी जमात को हजम नहीं हो रहे हैं | वैसे भी केजरीवाल जिस बेबाकी से मीडिया को उत्तर देते हैं उससे पत्रकारों के पसीने प्रेस कांफ्रेंस में छूट जाते हैं |जबसे अम्बानी सरीखे कॉरपरेट घराने को आम आदमी पार्टी ने  पर लिया है तबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें सुर्खी देनी भी बंद कर दी है क्युकी कॉरपरेट के आगे इस दौर में सब नतमस्तक हैं । अम्बानी को तो करोडो की छूट इस दौर में मिलती है लेकिन आम आदमी को तो सब्सिडी भी नहीं मिलती । सभी राजनीतिक दलों के नारों में आम आदमी जरुर है लेकिन नीतियां बनाने से लेकर नियोजन में सब जगह कॉरपरेट हावी है । दिल्ली के चुनावो में कूदकर अब केजरीवाल नए सिरे से राजनीती को परिभाषित करने जा रहे हैं जिसके केंद्र में पहली बार आम आदमी रहेगा | अब तक देश की सभी पार्टियों द्वारा वह आम आदमी छला जाता रहा है | वह इसे बखूबी जानते हैं और इसकी खुशबू उन्होंने अपने सरकारी सेवाकाल के दौरान भी महसूस की  है |   नवंबर में दिल्ली का मिजाज राजनीती के बैरोमीटर में केजरीवाल की असल ताकत को बतलायेगा लेकिन फिलहाल  तो  आप की असल ताकत का एहसास हमें  ८ दिसंबर को ही हो पायेगा । तो इन्तजार कीजिये  दिल्ली के विधान सभा  चुनावो के परिणामो का  .....

हर्षवर्धन पान्डे                                    



 उत्तर प्रदेश  के डूबते जहाज को बचाने में जुटी भाजपा

हर्षवर्धन पान्डे

" दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। " यह कथन भारतीय राजनीती के सम्बन्ध में परोक्ष रूप से सही मालूम पड़ता है |   आज उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है। बड़े  पैमाने पर भाजपा और कांग्रेस का ब्राह्मण वोट आपस में छिटक गया है और यही वोट बसपा और सपा में बट  गया है ।  यह सवाल सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में  जिसको कचोट रहा है वह है  उत्तर प्रदेश  की भाजपा ।  यू पी  मे पार्टी की सेहत सही नही चल रही है। हाल ही मे   प्रदेश में   चुनाव प्रचार की कमान  पूरी तरह  नरेन्द्र मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह  को   सौपे जाने को विश्लेषक  एक नई  कड़ी का हिस्सा मान रहे है । . सूत्र बताते है कि संघ  पिछले विधान सभा के चुनावो से कुछ सबक लेना चाह रहा है लेकिन राजनाथ  की इस साल बिछाई  गई बिसात में संघ की एक भी नहीं चल रही । इसी के चलते  इस बार  चुनाव में उत्तर प्रदेश में कद्दावर नेताओ को एक एक करके चुनावो से किनारे लगाया जा रहा है ।

राजनाथ  की बिसात  " जिताऊ " उम्मीदवारों के रास्ते जहाँ गुजरती  है वही  संघ का रास्ता उसके स्वयंसेवको  और पार्टी का झंडा लम्बे समय से उठाये नेताओ के आसरे गुजरता है  । दिल्ली मे पार्टी के एक नेता की माने तो इस बार अपने हाई टेक फोर्मुले के सहारे  सपा और बसपा के साथ जा मिले ब्राहमण वोट बैंक को वापस अपनी तरफ लेने की कोशिशे ना केवल  तेज कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस के वोट बैंक पर   सेंध सपा के जरिये  लगा रहे हैं ।  उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर  में हुए सांप्रदायिक दंगो के बाद पहली बार  सपा और भाजपा को लाभ मिलता दिख रहा है । अगर भाजपा का इस बार का हिंदुत्व कार्ड अमित शाह के जरिये चल गया तो   भाजपा और सपा  की प्रदेश में चांदी  तय है ऐसे में बसपा और कांग्रेस के वोट बैंक में सैंध  लगनी तय है ।   पार्टी के नेताओ का मानना है कि  ब्राहमण   वोट बैंक शुरू से उसके  साथ रहा है लेकिन बीते कुछ  चुनावो मे यह माया मैडम के साथ जा मिला तो वहीँ इस बार के विधान सभा चुनावो में यह सपा के पास गया  है ।  इसको फिर से अपनी  ओर लाकर ही  उत्तर  प्रदेश  में पार्टी की ख़राब हालत सुधर सकती है शायद इसी के मद्देनजर भाजपा के नाथ  की बिसात में जहाँ वह एक छोर  पर  खुद खड़े   हैं  तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के  कार्ड को खेलकर उसने ब्राहमण और ठाकुर  वोट के अलावे अन्य पिछड़े वोट  को अपने  पाले में लाने का नया फ़ॉर्मूला बिछाया है ।

यह बताने कि जरुरत किसी को नहीं कि राजनाथ और कलराज  मिश्र  के  समर्थक उत्तर प्रदेश में शुरू  से एक दूसरे के आमने सामने खड़े रहते थे । . पहली  बार अपनी बिसात में  राजनाथ ने नई व्यूह रचना इस प्रकार की है जिसके जरिये हिन्दू वोट बैंक को पार्टी अपने पाले में ला सके ।.  इस बार राजनाथ  ने  जहाँ  एक ओर  प्रदेश  अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी  खेमे को भी चुनावी चौसर बिछाने में साथ लिया है तो वहीँ  कल्याण सिंह ,  उमा भारती को "स्टार प्रचारक " बनाकर और पिछड़ी जातियों के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की  गोल बंदी कर डाली है  । यही नहीं राजनाथ इस बार अन्य दलों से नाराज चल रहे विधायको पर भी नजर गढाए हैं । आने वाले दिनों में अगर कई विधयक भाजपा के पाले में जायें तो किसी को   कोई आश्चर्य  होना चाहिए  इतना जरुर है इन सबके  जरिये पहली बार राजनाथ  ने संघ की हिंदुत्व प्रयोगशाला के सबसे बड़े झंडाबरदार  योगी आदित्यनाथ और विनय कटियार सरीखे नेता को अगर टिकट चयन से दूर रखा है तो समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के चुनावो में किस तरह  संघ ने अपने लाडले राजनाथ पर पूरा भरोसा जताया है ।  यही नहीं इस बार  राजनाथ  ने टिकट  जीतने वाले उम्मीदवारो  पर डाव लगाने की ठानी है  और चुनावो से पहले ही  अपने इरादे जता दिए है जिससे लम्बे समय से पार्टी का झंडा उठाये हुए नेताओ की दाल  गलनी मुश्किल दिख  रही है क्युकि वही नेता टिकट  में कामयाब होगा जो अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की चुनावी बिसात में फिट बैठेगा । वही अमित शाह को आगे कर मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना बड़ा दाव चलकर एक बार फिर  अपने कदम यु पी  की तरफ बड़ा दिए हैं । मोदी इस बात को बखूबी समझ रहे हैं अगर भाजपा ने आगामी लोक सभा चुनाव में दिल्ली में सरकार बनानी है तो  लिटमस टेस्ट उत्तर प्रदेश ही होगा । यहाँ अच्छा  करने  पर ही पार्टी केंद्र में सरकार  बनाने का दावा ठोक  सकती है ।       .

 कुछ महीने पहले से ही पार्टी संसदीय बोर्ड में  हिंदुत्व के मुद्दे पर चर्चा की अटकलें सुनाई दे रही थी  ।  उत्तर प्रदेश भाजपा की  हिंदुत्व प्रयोगशाला का पहला पड़ाव रहा है जहाँ राम लहर की  धुन बजाकर  भाजपा  ने कभी राज्य में अपनी सरकार बनाई थी ।  पार्टी  के नेता मानते है हिंदुत्व की आधी मे वह केन्द्र मे सत्ता मे आयी लेकिन अपने कार्यकाल मे उसने कई मुद्दों को ठंडे बस्ते मे डाल दिया जिस कारण केन्द्र में यू पी ऐ की सरकार आ गयी और बीजेपी अवसान की ओर चली गयी। इस बार पार्टी फिर हिन्दुत्व पर वापस लौटने  का मन बना रही है पार्टी की चाल देखकर ऐसा लगता है कि वह अपनी हिंदुत्व की आत्मा को अलग कर नही चल सकती और मोदी उसकी इस बिसात में उत्तर प्रदेश में तारणहार बन सकते हैं । अयोध्या आन्दोलन के दौर में उत्तर प्रदेश में  की  नैय्या  इसी हिन्दू कार्ड ने पार लगाई और अब भाजपा मोदी के जरिये राजनीति के मैदान पर ध्रुवीकरण वाला वही फार्मूला चल रही है  जिसने नब्बे के दशक में भाजपा को बड़ी पार्टी के रूप में ना केवल उभारा  बल्कि हिंदुत्व की छाँव तले  उसे राष्ट्रवाद से जोड़ा ।  आज के दौर में भाजपा के पास मोदी के अलावा कोई   नहीं है जो बड़े पैमाने पर    ध्रुवीकरण कर पार्टी की सीटें बड़ा सके  और इसी को ब्रांड बनाकर भाजपा विकास के जरिये मोदिनोमिक्स की छाँव तले उत्तर प्रदेश के अखाड़े में  बड़ा सवाल यह है कि वह सबको साथ लेने के किस फोर्मुले पर चलेगी ? इतिहास गवाह है केंद्र में सत्ता  हथियाने के बाद पार्टी मे पिछडे नेताओ को उपेक्षित बीते कुछ समय  से रखा जाता रहा है.....

 जब पार्टी मे यह तय हो चुका है वह आगामी चुनाव मे अपने ओल्ड एजेंडे पर चल रही है तो ऐसे मे पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश  सबसे बड़ी रन भूमि बन गया है....यही वह प्रदेश है जहाँ की सांसद  संख्या दिल्ली का ताज तय करती है ...... वैसे भी पूत के पाव पालने मे ही दिखाए देते है बीजेपी भी इसको अच्छी तरह से जानती है, तभी वह आजकल बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का तोड़  निकालने मे जुटी है। बीजेपी के अन्दर के सूत्र बताते है कि ब्राह्मणों को लुभाने की मंशा  से पार्टी ने अपने पांच   ट्रंप  कार्ड फैक दिए है जो पार्टी का जहाज उत्तर प्रदेश  में  बचाने की  पूरी कोशिश  करेंगे........ पहला कार्ड राजनाथ  सिंह  का है जो  चुनाव  प्रभारी है.... वह ख़ुद  ठाकुर  है ....दूसरा कार्ड राज्य मे मौजूद पार्टी प्रेजिडेंट  लक्ष्मी कान्त वाजपेयी    का है जो खुद  ब्राह्मण हैं   तीसरा  कार्ड  जो  फेंका  गया है वह है  कलराज मिश्रा वह  उत्तर प्रदेश में ब्राहमण बिरादरी का झंडा लम्बे समय  से  उठाये  है.....


अटल बिहारी की खडाऊं पहनकर लखनऊ से सांसद तो है ही साथ ही यू पी की सियासत को बखूबी समझते है   ........ चौथा कार्ड हाल ही  मे  मोदी  के रूप में के रूप में फेंका गया है जिसके जरिये पार्टी पिछडो के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की जुगत में है .......  यही नहीं पांचवे कार्ड के रूप  में रामेश्वर चौरसिया के रूप में फेंका गया है  जो अमित शाह के साथ सहराज्य प्रभारी बनाये गए हैं ।   पार्टी का मानना है  राज्य मे ब्राहमणों   की बड़ी संख्या  १६ वी  लोक सभा चुनाव मे उसका गणित सुधार सकती है साथ मे हिंदुत्व का मुखोटा फिर से पहनने  से उसका खोया जनाधार  वापस आ सकता है.......वैसे भी नब्बे  के दशक  मे राम मन्दिर की लहर ने हिंदू वोट को उसकी ओर खीचा था जिसके बूते सेण्टर मे न केवल उसकी  सीटें  बढ़ी  बल्कि केंद्र  मे वाजपेयी की सरकार भी सही से चली थी ..............

राजनाथ अपनी पार्टी की केंद्र में सत्ता  में वापसी   के लिए उत्तर प्रदेश  पर टकटकी लगाये हुए है..... वह इस बात को जानते है कि  पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में  इस बार पतली हालत होने पर उनका सपना पूरा नही हो पायेगा...... वैसे भी
 उत्तर प्रदेश   फतह के बिना दिल्ली मे सरकार की कल्पना करना मुंगेरी  लाल के हसीन  सपने देखने जैसा है। अतः पार्टी पहले इस यू पी  की चुनोती से पार पाना चाहती है....लोक सभा के लिए बीजेपी  अभी से कमर कस चुकी है ....पार्टी द्वारा पिछले  चुनाव मे अपने एजेंडे से भटकने के कारण  संघ भी इस  बार अपने को यू पी के चुनावो से दूर कर रहा है...... संघ मानता है  दलित और मुस्लिम वोट शुरू  से कांग्रेस के साथ रहा है लेकिन पिछले कुछ  चुनाव मे यह बसपा और सपा  के साथ जा मिला..... प्रदेश के ब्राहमण मतदाताओ  के  माया  के  साथ जाने से भाजपा  की हालत  सबसे ख़राब हो गयी है....


अतः राजनाथ  का रास्ता  ब्राहमणों के वोट बैंक  को बीजेपी के साथ लेने की कोशिशो  मे जुटा है...... बीजेपी बीते  चुनावो  से इस बार सबक ले रही है..... समय समय पर उत्तर प्रदेश  को लेकर मीटिंग हो रही है..हर बैठक में   उत्तर प्रदेश को लेकर गंभीर मंथन हो रहा है ....   राजनाथ  सिंह   के पास विरोधियो को राजनीती की पिच  पर मौत देने का तोड़  है........अपनी छमताओ  को वह बीते कुछ वर्षो मे कर्नाटक , बिहार, हिमांचल, उत्तराखंड , गुजरात मे साबित कर चुके है ... अब बारी उनके खुद के प्रदेश उत्तर प्रदेश की है जहाँ के वह  मुख्य मंत्री भी रह चुके है ..... यह  बड़ा प्रदेश है.... हालात  अन्य प्रदेश से अलग है..... यहाँ पर खेलने के लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है.......  पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में हालत सही करने का जिम्मा अब राजनाथ   और कलराज  के कंधो  मे है .....उनको अच्छा तभी कहा जा सकता है जब वह पार्टी को  प्रदेश  मे अच्छी सीट दिलाने में मदद करें.....

 २००२ के  चुनाव में बीजेपी को विधान सभा मे ४०२ सीट् मे ५१ सीट ही मिल पाई..... १४६ मे उसके जमानत जब्त हो गयी इसके बाद वहां के चुनाव मे पार्टी ४ नम्बर पर आ गयी ......बसपा को ३०.४३% वोट  मिले.... समाजवादी  पार्टी को ९७ सीट हासिल हुई ... वोट  २५% रहा वही बीजेपी  का  १६% रहा ....इसके  बाद तो पार्टी का  २००७  मे ऐसा जनाजा  निकला  पार्टी की माली  हालत  खस्ता  हो गयी...... ऐसे मे राजनाथ के सामने  उत्तर प्रदेश की  पुरानी  खोयी हुई जमीन को बचाने की बड़ी चुनौती  है.......  देखना होगा   राजनाथ की  इस नयी बिसात में ये चारो कहाँ  फिट बैठते है?  वह भी ऐसे समय में जब  राज्य में पार्टी के पुराने  संजय जोशी, विनय कटियार, योगी  सरीखे चेहरे हाशिये  पर है..........

 राजनाथ  पार्टी का   पुराना  चेहरा है.........  उनको कलराज मिश्र  की तरह यू पी की गहरी समझ है .... साथ में उमा और वाजपेयी  की जोड़ी उत्तर प्रदेश में भाजपा की साख को बचाने का काम कर सकती है...........इन चारो  को आगे कर भाजपा उत्तर प्रदेश में समाज के हर वर्ग में अपनी उपस्थिति सामाजिक समीकरणों के जरिये बिछा रही  है ........ ब्राहमण  से लेकर ठाकुर , राजपूत से लेकर पिछड़ी जातियों पर डोरे डालकर हर किसी को लुभाने का दाव  राजनाथ चल रहे हैं । राजनाथ की इस बार  की  बिसात में अगर कलराज ,राजनाथ उमा ,वाजपेयी की चौसर बिछी है तो वही  असंतुष्ट नेताओ से  पार पाना भी भाजपा की बड़ी मुश्किल बनती जा रही है ....क्युकि अगर इस चुनाव में योगी, कटियार , संजय जोशी सरीखे कई कद्दावर नेताओ की  एक भी नहीं चलेगी  और उनके जैसे कई कार्यकर्ता जो पार्टी का झंडा  वर्षो  से उठाये है वह भी अगर इस दौर  हाशिये  में चले जायेंगे  तो ऐसे में कीचड में कमल खिलने में  परेशानी हो सकती है...... वैसे भी पिछले दिनों बाबू सिंह कुशवाहा  के मुद्दे पर पार्टी की खासी किरकिरी हो चुकी है..... ऐसे में चुनावी डगर  मुश्किल दिख रही है..... फिर भी संघ  की गोद से  निकले राजनाथ अगर संघ से दूरी बनाकर पूरे उत्तर प्रदेश को  साधने की कोशिश कर रहे है तो उसे उत्तर प्रदेश में भाजपा के डूबते जहाज को बचाने की अंतिम कोशिशो के तौर पर  ही देखा जाना चाहिए......




बिन सचिन सब सून .....


हर्षवर्धन पाण्डे - 


  "जीवन भर मेरा सपना था भारत के लिए क्रिकेट खेलने का. पिछले 24 वर्षों से मैं हर दिन ये सपना जी रहा था. मेरे लिए अपनी ज़िंदग़ी का एक भी दिन बिना क्रिकेट के सोचना मुश्किल है क्योंकि 11 साल की उम्र से मैं यही कर रहा हूँ. अपने देश का प्रतिनिधित्व करना और दुनिया भर में खेलना मेरे लिए बड़े गौरव की बात रही है. मैं अपनी ज़मीन पर 200वाँ टेस्ट खेलने को लेकर

उत्सुक हूँ."

       सचिन रमेश तेंदुलकर  द्वारा  मीडिया  को दिए गए इस बयान का मजमून सचिन के ऐतिहसिक सफ़र की तस्दीक कराने के लिए काफी है । 24 बरस  ... 463 वन डे  मैच ..18426 रन ... 86.23 का स्ट्राइक रेट ...  198   टेस्ट  मैच, 15837 रन . इन बरसों में कई बल्लेबाज टीम में आये और कई गए  । कई गेदबाज टीम में अपनी जगह बनाने में सफल हुए तो कई कुछ मैच  खेलने  के बाद न जाने कहाँ गुमनामी के अंधेरो में खो गए। इस दौरान खेल भी बदला समय ने ऊँची करवट   ली लेकिन एक चीज जो नहीं बदली वह थी सचिन रमेश तेंदुलकर के तीन फीट लम्बे भारी बल्ले की धमक जिसकी आग ने मानो विपक्षी टीम का मान मर्दन करा दिया । सचिन का बल्ला अपनी आग उगलता रहा और क्रिकेट की किताब में एक -एक रन दर्ज होकर इतिहास बनता गया । शायद इसी वजह से भारतीय क्रिकेट का यह सितारा इतिहास में कोहिनूर बन गया और क्रिकेट का भगवान कहा जाने लगा  लेकिन क्रिकेट के भगवान की   वन डे पारी का ऐसा खामोश अंत इस तरह बेबस ढंग से होगा इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी । बीते दिनों अचानक सचिन ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह देश के करोडो प्रशंसको को निराश कर दिया ।


जिस समय  बी सी सी आई के चयनकर्ता नवम्बर  में वेस्ट  इंडीज के साथ 
नवम्बर  में   खेली जाने वाली  सीरीज  के लिए  तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटे थे  ठीक उसी समय क्रिकेट का यह भगवान  टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहने की तैयारियों में जुटा  हुआ था । बीते  शुक्रवार को को सचिन ने बी सी सी आई के जरिए जारी किये गए एक प्रेस नोट में टेस्ट  फोर्मेट से सन्यास का फैसला लेकर सभी को चौंका दिया । 40 साल के सचिन 200वाँ टेस्ट खेलने के बाद संन्यास ले लेंगे. सचिन दिसंबर 2012 में वन डे इंटरनेशनल से संन्यास ले चुके हैं.  शाम  ढलते ढलते यह खबर सभी की जुबान पर छा  गई । सचिन के टेस्ट  से सन्यास पर विपक्षी टीम के गेंदबाजो  ने भले ही राहत की सांस ली हो लेकिन इस खबर ने उनके करोडो प्रशंसकों को मायूस ही किया ।



सचिन अपना अंतिम टेस्ट  मैच  अपने घरेलू मैदान वानखेड़े में  खेलेंगे लेकिन पिछले कुछ समय से उनके प्रदर्शन पर न केवल पूर्व भारतीय कप्तानो की एक बड़ी जमात सवाल उठा रही थी वरन उनको टीम से बाहर करने का ताना  बाना बुन रही थी जिसमे चयनकर्ताओ के आसरे उन पर मजबूरन सन्यास का दबाव बनाया जा रहा था और शायद यही कारण था सचिन ने किसी के दबाव  के आगे न झुकते हुए अपने अंतर्मन की आवाज को सुना और खुद को अब टेस्ट क्रिकेट  से दूर करने का फैसला कर  लिया । जबकि यह सच  शायद ही किसी से छुपा है सचिन का प्रदर्शन पिछले कुछ समय से टेस्ट क्रिकेट में ही खराब चल रहा था । इस दौरान वह अपनी कई पारियों में 'क्लीन बोल्ड' हो गए थे ।  उनकी तकनीक को लेकर पहली बार इस दौर में सवाल उठने लगे जिसके बाद चयनकर्ताओ ने सचिन को नसीहत दे डाली अब नए खिलाडियों को मौका  देने की मांग जोर पकड़ रही है लिहाजा वह खुद से  सोचकर यह तय करें कि आगे उन्हें क्या करना है ? इसी के तहत "फेबुलस फोर " की जमात में शामिल रहे  गांगुली ,राहुल द्रविड़, लक्ष्मण से  बीते  दिनों जबरन सन्यास दिलवाया गया और सचिन भी चयनकर्ताओ की इस गुगली के फेर में आ गए  ।



अपने अब तक के करियर में सचिन ने रिकार्डो का जो पहाड़ मैदान में खड़ा किया है उसे शायद ही आने वाले दिनों में कोई छू पाए । सचिन के नाम वन डे , टेस्ट मैचो में सबसे अधिक मैच , सबसे अधिक रन , शतक, अर्धशतक बनाने कारिकॉर्ड जहाँ दर्ज  है वहीँ सबसे अधिक मैन आफ द मैच से लेकर  मैन आफ द सीरीज जीतने तक के रिकॉर्ड दर्ज हैं । तभी सर डॉन ब्रेडमैन ने एक दौर में सचिन में अपना अक्स देखा था और शेन वार्न  सरीखे कलाई के जादूगर की रातो की नीद को उड़ा डाला था । सचिन के नाम अन्तर्राष्ट्रीय  क्रिकेट में 100 शतको का रिकॉर्ड दर्ज है । इसी साल मार्च में सचिन ने अपना आखरी शतक बांग्लादेश के खिलाफ ठोंका  था । सचिन ने 463 वन डे मैचो की 452 परियो में 44.83 की औसत से 18426 रन बनाये तो वहीं वन डे में 49 शतक बनाकर अपनी

बल्लेबाजी का लोहा पूरी दुनिया के सामने मनवाया । फ़रवरी 2010 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वन डे में  दोहरा शतक लगाने  वाले पहले खिलाडी बनने के साथ ही गेदबाजी में अपना कमाल 154 विकेट लेकर दिखाया । साझेदारी बनाने से लेकर साझेदारी तोड़ने तक में सचिन का कोई सानी नहीं  था । दो बार उन्होंने वन डे मैचो में एक साथ 5 विकेट झटकने के साथ ही सर्वाधिक 62  बार मैन आफ द मैच से लेकर 15 बार मैन आफ द सीरीज का रिकॉर्ड अपने नाम किया ।  वाल्श से लेकर डोनाल्ड , अकरम से लेकर वकार , शोएब अख्तर से लेकर ब्रेट ली और फिर शेन वार्न  से लेकर  मुरलीधरन सबकी गेदबाजी से सामने सचिन ऐसे चट्टान की  भांति डटे  रहते थे  जिनका विकेट हर किसी के लिए अहम हो जाता था । 15 नवम्बर 1989 को पाकिस्तान के विरुद्ध  महज 16 साल की उम्र में घुंघराले बाल वाले इस युवा खिलाडी ने जब  अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था को किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था कि भविष्य में यह खिलाडी  क्रिकेट के देवता के रूप में पूजा जायेगा लेकिन सचिन ने अपनी प्रतिभा 1988 में ही दिखा दी जब अपने बाल सखा  विनोद काम्बली के साथ  664 रन की

रिकॉर्ड साझेदारी कर इतिहास रच  डाला  था । पाकिस्तान के दौरे में अब्दुल कादिर की गुगली पर उपर से छक्का जड़कर उन्होंने अपने इरादे  जता  दिए थे । यही नहीं उस दौर को अगर याद  करें तो सियालकोट के टेस्ट में एक बाउंसर सचिन की नाक में जाकर लग गया । नाक से खून बह रहा था लेकिन इन सबके बीच सचिन मैदान से बाहर नहीं गए और डटकर गैदबाजो  का सामना किया ।



1990 में इंग्लैंड का ओल्ड ट्रेफर्ड सचिन का पहले शतक का गवाह बना जब उन्होंने विदेशी धरती से अपनी अलग पहचान बनाने में सफलता पायी । इसके बाद सिडनी और पर्थ की खतरनाक समझी जाने वाली पिचों पर सचिन ने अपनी शतकीय पारियों से प्रशंसको का दिल जीत लिया । इसके बाद तो उनके नाम के साथ हर दिन नए रिकॉर्ड जुड़ते गए । आज सचिन की इन उपलब्धियों के पहाड़ पर कोई खिलाडी दूर दूर तक उनके पास  तक नहीं फटकता ।  सचिन में एक खास तरह की विशेषता भी है जो उनको अन्य  खिलाडियों से महान बनाती है । उनका क्रिकेट के प्रति जज्बा देखते ही बनता है और पूरे करियर के दौरान उन्होंने इसे जिया । शालीन और शांतप्रिय होने के अलावे धैर्य और अनुशासन उनमे ऐसा गुण था कि विषम परिस्थितियों में में सचिन अपना रास्ता खुद से तय करते थे । कभी शून्य पर भी आउट हो जाते तो आलोचकों को करारा  जवाब अपने खेल से ही देते । टीम इंडिया में एक मार्गदर्शक के तौर पर उन्होंने युवाओ को एक नया प्लेटफार्म दिया जहाँ उनसे सलाह मांगने वालो में खुद धोनी , युवराज , भज्जी सरीखे खिलाडी शामिल रहते थे । प्रत्येक खिलाडी उनसे कुछ नया सीखने की कोशिश में रहता । यह हमारे लिए फक्र की बात है सचिन को हमने उनके शुरुवाती  दौर से खेलते हुए देखा है । आने वाले भावी पीढियों  को  हम सचिन की गौरव गाथा बड़े गर्व के साथ सुना पाएंगे ।



सचिन के लिए वर्ल्ड कप एक सपना था और धोनी की अगुवाई वाली टीम का हिस्सा बनने पर उन्हें काफी नाज है । इसकी झलक  वन डे और फिर टेस्ट  से सन्यास के समय उनके द्वारा दिए बयानों में साफ झलकी जहाँ उन्होंने टीम के वर्ल्ड कप जीतने पर  ख़ुशी जताई और अगले वर्ल्ड कप के लिए अभी से एकजुट हो जाने की बात कही । सचिन जैसे कोहिनूर अब भारत को शायद ही मिलें क्युकि  सचिन जैसे समर्पण की बात आज के खिलाडियों में नदारद है । क्रिकेट आज एक मंडी में तब्दील हो चुका  है जहाँ खिलाडियों की करोडो में बोलियाँ लग रही हैं । सारी  व्यवस्था मुनाफे पर जा टिकी है जहाँ खेल का पेशेवराना पुरानाअंदाज गायब है जो अस्सी और नब्बे के दशक में देखने को मिलता था । आज युवा खिलाडियों की एक बड़ी जमात ट्वेंटी  ट्वेंटी के जरिये अपनी प्रतिभा को दिखा रही है जबकि वन डे और टेस्ट क्रिकेट से उनका मोहभंग हो गया है । यही नहीं इसमें उनका प्रदर्शन भी फीका ही रहा करता है । ऐसे में बड़ा सवाल यहीं से खड़ा होता है सचिन, गांगुली, राहुल , वी  वी एस  वाली लीक पर कौन आज के दौर में चलेगा वह भी उस दौर में जब ट्वेंटी ट्वेंटी टेस्ट से लेकर वन डे को लगातार निगल रहा है ।



 बहरहाल सचिन ने वन डे  अब टेस्ट से सन्यास के बाद करोडो चहेते प्रशंसको को निराश कर दिया है ।  टेस्ट से अचानक लिए गए सन्यास पर  सस्पेन्स अब भी बना है । आगे भी शायद यह बना रहे क्युकि मैदान से अन्दर और बाहर सचिन जिस शानदार  टाइमिंग से खेलकर कई लोगो को आईना दिखाते थे वैसी टाइमिंग उनके टेस्ट से  सन्यास लेते समय  देखने को नहीं मिली  । जाहिर है सचिन पहली

बार चयनकर्ताओ  के निशाने पर सीधे तौर पर आये और आखिरकार दबाव  झेलने की वजह से उन्होंने टेस्ट  से अचानक सन्यास की घोषणा कर सभी को  चौंका ही दिया और शायद स भावुक पल में उन्होंने मीडिया के सामने आना भी मुनासिब नहीं समझा लेकिन जो भी हो सचिन  ने  रिकार्डो  का जो पहाड़ अब तक खड़ा किया है शायद आने वाले दिनों में कोई इसके आस पास तक फटक पाए ।

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