सत्ता राजनीति की हिन्दी सोशल मीडिया में हिन्दी की अनिवार्यता के फैसले से उठा तूफान फिलहाल शांत हो गया है. लेकिन ये मुद्दा तो बन ही गया है. एक भाषा एक राष्ट्र के हिन्दूवादी नारे के बीच भाषाई मेलमिलाप की ऐतिहासिकता खतरे में पड़ती दिखती है. भारतीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने 10 मार्च को एक सर्कुलर निकाला था जिसके मुताबिक सोशल मीडिया के मंचों पर हिन्दी को बराबरी का महत्व देना होगा. चुनाव अभियान के बीच सर्कुलर दब गया लेकिन नतीजे आने के बाद "विभागीय रूटीन कार्रवाई" में आगे बढ़ा दिया गया. ये 27 मई की बात है जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके थे. बेशक सर्कुलर की भूमिका यूपीए सरकार के समय बनी थी लेकिन मोदी सरकार भी इसमें आधे की भागीदार बनी. नई सरकार के आते ही कोई ऐसी फाइल आगे बढ़ जाए जिसका संबंध भाषायी संवेदनशीलता से है तो कुछ हैरानी और संशय तो होता ही है. फैसला आते ही तमिलनाडु सहित देश के कई अहिन्दी भाषी इलाकों से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं. सरकार ने विवाद का अंत ये कह कर किया कि सोशल मीडिया से संबंधित राजभाषा विभाग का निर्देश सिर्फ हिन्दी पट्टी में लागू होगा....