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25 जून 2014

सत्ता राजनीति की हिन्दी

सोशल मीडिया में हिन्दी की अनिवार्यता के फैसले से उठा तूफान फिलहाल शांत हो गया है. लेकिन ये मुद्दा तो बन ही गया है. एक भाषा एक राष्ट्र के हिन्दूवादी नारे के बीच भाषाई मेलमिलाप की ऐतिहासिकता खतरे में पड़ती दिखती है.

भारतीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग ने 10 मार्च को एक सर्कुलर निकाला था जिसके मुताबिक सोशल मीडिया के मंचों पर हिन्दी को बराबरी का महत्व देना होगा. चुनाव अभियान के बीच सर्कुलर दब गया लेकिन नतीजे आने के बाद "विभागीय रूटीन कार्रवाई" में आगे बढ़ा दिया गया. ये 27 मई की बात है जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके थे. बेशक सर्कुलर की भूमिका यूपीए सरकार के समय बनी थी लेकिन मोदी सरकार भी इसमें आधे की भागीदार बनी. नई सरकार के आते ही कोई ऐसी फाइल आगे बढ़ जाए जिसका संबंध भाषायी संवेदनशीलता से है तो कुछ हैरानी और संशय तो होता ही है. फैसला आते ही तमिलनाडु सहित देश के कई अहिन्दी भाषी इलाकों से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं. सरकार ने विवाद का अंत ये कह कर किया कि सोशल मीडिया से संबंधित राजभाषा विभाग का निर्देश सिर्फ हिन्दी पट्टी में लागू होगा.

हिन्दी का विवाद आज का नहीं है. 1965 में सरकार इसे राजभाषा का दर्जा देना चाहती थी लेकिन देश के अहिन्दी भाषी दक्षिण इलाकों में जबरदस्त आंदोलन फूटा था. तमिलनाडु उस उग्रता का केंद्र बना था. केंद्र के फैसले के विरोध में 1964 के अंत से वहां आंदोलन भड़क उठा. दंगे और आत्मदाह तक हुए. केंद्र को फैसला वापस लेना पड़ा लेकिन कांग्रेस के लिए एक दूरगामी क्षति का सबब बन गया. 1967 का विधानसभा चुनाव हार गई और तबसे अब तक तमिलनाडु में वो सत्ता में नहीं आ पाई.

 भाषा को लेकर संघर्ष

भाषा को लेकर संघर्ष

बीजेपी के लिए ये चेतावनी और याददिहानी का वक्त है. एक भारत, श्रेष्ठ भारत के चुनावी नारे और आरएसएस की वैचारिकी से लैस होकर राजनीति तो की जा सकती है लेकिन देश नहीं चलाया जा सकता. "हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान" की अवधारणा सांस्कृतिक विविधता वाले विराट देश के लिए घातक है. एकतरफा सोच से अलग अलग भाषा समूहों और प्रांतों में रहने वाले नागरिकों के बीच अलगाव और टकराव बनता है. सब अपनी अपनी भाषा का लट्ठ लेकर उतरेंगे तो सोचिए क्या होगा. भाषा और साहित्य के चिंतक डॉक्टर रामविलास शर्मा ने कहा है कि, "इस कोलाहल में दो बातें हम भूल जाएंगे. पहली ये कि केंद्रीय भाषा के इस विवाद से देश की वास्तविक भाषा संबंधी स्थिति पर पर्दा पड़ जाता है. केंद्रीय भाषा के रूप में तो अंग्रेजी रहती ही है, विभिन्न प्रदेशों में भी वहां की भाषाओं के हक छीन कर राज्य भाषाओं के रूप में अंग्रेजी जमी रहती है. सबसे पहली आवश्यकता ये है कि भारतीय भाषाएं अंग्रेजी की दासता से मुक्त हों."

सभी भाषाओं को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार को एक उदार और खुला रवैया अपनाना चाहिए. जिस भाषायी क्षेत्र से जो प्रतिनिधि संसद में आता है उसे अपनी भाषा में बोलने की सुविधा मिले, सरकार के फैसलों की कॉपी हर भाषा में हो और मीडिया को प्रेस रिलीज भी अपनी अपनी भाषाओं में मिले. 22 आधिकारिक भाषाएं देश में हैं तो इन सबका एक साथ निर्वहन करने में तो लगता नहीं कि इस देश की विराट सत्ता व्यवस्था और कार्य मशीनरी को कोई भारी दिक्कत आ सकती है. यूरोपीय संघ इसकी मिसाल है, जहां 24 आधिकारिक भाषाएं हैं.

इससे सीधे तौर पर तीन प्रमुख लाभ नजर आते हैं. पहला तो यही है कि अंग्रेजी का वर्चस्व कम होगा और दूसरा ये कि विभिन्न भारतीय भाषा संस्कृतियों का मुख्यधारा में आकर हीनताबोध खत्म हो जाएगा. तीसरा लाभ ये है कि भाषा के प्रति सम्मान बढ़ेगा और जब ऐसा होगा तो भाषा उपभाषा और उनकी बोलियों की हिफाजत भी हो पाएगी. आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौतियों में भाषा को गायब होने से बचाने की चुनौती भी एक है. सत्ता और प्रशासन के स्तर पर नई कोशिशें इस तरह एक बड़े विहंगम और दूरगामी काम को अंजाम दे सकती हैं. लेकिन क्या सरकार में इतनी नैतिक इच्छाशक्ति है कि किसी एक भाषा को लेकर मताग्रही होने के बजाय वो तमाम भाषाओं की एक जीवंत आवाजाही को मुमकिन कर सके.

विख्यात अमेरिकी चिंतक और भाषाविद नॉम चोमस्की का कहना है, "भाषा मुक्त रचना की प्रक्रिया है. उसके नियम और सिद्धांत बेशक तय हैं, लेकिन पीढ़ियां उन्हें जिस तरह से इस्तेमाल करती हैं वो मुक्त और अनंत रूप से विविध है." ये बात भारत पर भी लागू होती है. देश की कोई भी भाषा चाहे वो हिन्दी हो या मराठी या तमिल, नितांत अलगाव में नहीं फलीफूली. यूरोप की भाषाओं की तुलना में ये भाषाएं एक दूसरे से ज्यादा निकट रही है. उनका अपना भाषायी, व्याकरणीय, लिपिगत और ध्वनि सौंदर्य रहा है और ये सारे सौंदर्य एक दूसरे से टकराते नहीं रहे हैं. वे एक दूसरे के पूरक बने रहे हैं. भाषाओं में यही आवाजाही इस देश की सांस्कृतिक बहुलता की अद्भुत मिसाल है. अनेकता में एकता का भारतीय फलसफा यूं ही नहीं कायम हुआ है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी


बिहार में ट्रेन पटरी से उतरी, 4 मरे, 8 घायल

 छपरा  25 जून 2014 बिहार में छपरा के पास गोल्डन गंज स्टेशन पर बीती रात दिल्ली-ढिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस के पटरी से उतरने से कम से कम चार लोग मारे गए और आठ घायल हो गए। रेलवे के प्रवक्ता अनिल सक्सेना ने बताया कि बीती रात करीब 2 बजे ट्रेन के 12 डिब्बे पटरी से उतर गए। बी-1, बी-2, बी-3, बी-4 और पैंट्री कार समेत पांच डिब्बे उलट गए जबकि बी-5 से बी-10 तक छह दूसरे डिब्बे और पावर कार, स्टेशन पर पटरी से उतर गए। यह जगह पटना से करीब 75 किलोमीटर दूर है।
उन्होंने कहा कि दुर्घटना के कारण का अब तक पता नहीं चला है। रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने हादसे में लोगों के मरने पर दुख जताया है। उन्होंने रेल प्रशासन को घायल यात्रियों को हरसंभव इलाज मुहैया कराने के निर्देश दिए हैं। पूर्व मध्य रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और चिकित्सा दल घटनास्थल पर पहुंच गए हैं और राहत एवं बचाव अभियान की देखरेख कर रहे हैं। पीड़ितों एवं दूसरे यात्रियों के परिवारों को सूचना उपलब्ध कराने के लिए छपरा, समस्तीपुर, हाजीपुर, सोनपुर, बरौनी, मुजफ्फरपुर, लखनऊ, वाराणसी, बलिया, गुवाहाटी, ढिब्रूगढ़, तिनसुकिया, मरियानी, दीमापुर, लुमडिंग, न्यू कूचबिहार, न्यू जलपाईगुड़ी और कटिहार में हेल्पलाइन शुरू की गयी हैं।
ट्रेन हादसे की व्यापकता और उसके प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त डिब्बे हादसे के बाद रेल पटरी से करीब 700 फुट की दूरी पर जा गिरे। इसी बीच सारण के जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने इस हादसे के पीछे माओवादियों का हाथ होने की संभावना से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा लग रहा है कि हादसा परिचालन में आयी समस्या के कारण हुआ। उन्होंने बताया कि जिस पटरी से यह ट्रेन गुजर रही थी उसी से 15 मिनट पहले कविगुरु एक्सप्रेस ट्रेन सुरक्षित गुजरी है। दुर्घटनास्थल के शहरी इलाके में होने के कारण यहां माओवादियों द्वारा किसी प्रकार का बम लगाए जाने या पटरी को नुकसान पहुंचाने की कोई कोशिश आसानी से दिख सकती थी क्योंकि यहां लगातार लोग आते-जाते रहते हैं।
सारण जिला के पुलिस अधीक्षक सुधीर कुमार सिंह ने भी इस हादसे में माओवादियों का हाथ होने की संभावना को खारिज किया है। इस हादसे के बाद ट्रेन में सवार दूसरे यात्रियों को विशेष ट्रेन से पूर्व मध्य रेल मुख्यालय हाजीपुर लाया गया जहां से उन्हें उनकी यात्रा के अगले पड़ाव के लिए रवाना किया जाएगा। बचाव एवं राहत का जायजा लेने दुर्घटनास्थल पहुंचे सारण के सांसद राजीव प्रताप रूडी ने कहा कि हादसे की भयावहता को देखकर यह असामान्य घटना प्रतीत होती है लेकिन इसके कारणों के बारे में जांच के बाद ही पता चल पाएगा। रूडी ने बताया कि इस हादसे को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को जानकारी दे दी है और इसके बारे में गृह मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री को भी बता दिया है।


योजना आयोग को बंद नहीं करना चाहिए: आजाद

 श्रीनगर  24 जून 2014 कांग्रेस ने आज कहा कि भारतीय योजना आयोग को बंद नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसके अपने फायदे हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता कि कोई योजना आयोग को बंद करने के बारे में सोच सकता है। इसके अपने फायदे हैं।’’ उनसे योजना आयोग को खत्म करने के बारे में मीडिया में आयी खबरों के सिलसिले में सवाल पूछा गया था।
आजाद ने कहा, ‘‘यह महज एक अखबारी खबर है। बहुत सारी चीजें आ रही हैं और मुझे नहीं लगता कि अधिकतर अखबारी खबरों में उल्लेखित सभी बातें सच होती हैं।’’ उन्होंने कहा कि पार्टी संसद के आगामी सत्र में इस मुद्दे के बारे में पता लगायेगी। आजाद ने कहा, ‘‘अब संसद का सत्र आने वाला है। हम सत्र के दौरान इसके बारे में पता लगायेंगे।’’ अजय छिब्बर की अध्यक्षता वाले स्वतंत्र आकलन कार्यालय द्वारा तैयार रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि योजना आयोग को बंद कर दिया जाना चाहिए तथा इसकी जगह सुधार एवं समाधान लाया जाना चाहिए।


यूजीसी-डीयू विवाद में हस्तक्षेप से SC का इंकार

 नई दिल्ली  24 जून 2014 उच्चतम न्यायालय ने चार साल के स्नातक पाठ्यक्रम को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और दिल्ली विश्वविद्यालय के बीच छिड़े विवाद में हस्तक्षेप करने से आज इंकार कर दिया। न्यायालय ने इस पाठ्यक्रम को निरस्त करने के आयोग के निर्देश को चुनौती देने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर से कहा कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय जायें। न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह की अवकाशकालीन पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आदित्य नारायण मिश्रा से कहा कि चार वर्षीय स्नातक पाठ्क्रम को लेकर छिड़े विवाद में समाधान के लिये उन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश के खिलाफ उच्च न्यायालय जाना होगा। यह कार्यक्रम पिछले साल के शैक्षणिक सत्र से लागू किया गया था।
न्यायाधीशों ने कहा, ‘‘कृपया उच्च न्यायालय जायें। उच्च न्यायालय इस मामले पर विचार करेगा और हमें भी इस मसले पर (शीर्ष अदालत में मामला आने की स्थिति में) उच्च न्यायालय के तर्कों का लाभ मिलेगा।’’ दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के पूर्व अध्यक्ष मिश्रा ने याचिका में कहा है कि चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम वैध है और विश्वविद्यालय द्वारा जारी अध्यादेश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशानिर्देशों के अनुरूप है। मिश्रा अरबिन्दो कालेज में सहायक प्रोफेसर हैं। इस कार्यक्रम को लागू करने के एक साल बाद ही विश्वविद्यालय और अनुदान आयोग इसे लेकर टकराव की स्थिति में हैं। विश्वविद्यालय के शिक्षकों का एक वर्ग इस कार्यक्रम को वापस लेने के आयोग के निर्देश के खिलाफ 24 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठ गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय और इससे संबंद्ध सभी 64 कालेजों को निर्देश दिया था कि वे अपने यहां पिछले साल लागू चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के तहत नहीं बल्कि तीन वर्षीय स्नातक कार्यक्रम में ही छात्रों को प्रवेश दें।


इराकी सैनिकों का आकलन करने अमेरिकी बल बगदाद में

 वाशिंगटन 25 जून 2014 इराक भेजे जाने वाले 300 अमेरिकी सैन्य सलाहाकारों में सें लगभग आधे लोग और विशेष अभियान बल अब बगदाद में हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार अमेरिका ने इस संकट से घिरे हुए देश की मदद बढ़ा दी है और बगदाद भेजे गए इन लोगों ने सुन्नी आतंकियों के खिलाफ युद्ध में इराकी बलों की स्थिति का आकलन शुरू कर दिया है। इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड द लेवेंट के खिलाफ बड़ी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को सुगम बनाने के लिए कैपिटल हिल में ओबामा प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आयोजित संक्षिप्त बैठक से बाहर आए सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि इराक जल्दी ही एक नई सरकार बना सकता है। संभव है कि ऐसा अगले ही सप्ताह हो जाए। किर्बी ने कहा कि पेंटागन में नौसेना के रियर एडमिरल जॉन किर्बी ने मंगलवार को संवाददाताओं को बताया कि बगदाद में संयुक्त अभियान केंद्र शुरू करने के लिए विशेष बलों के दो दल, लगभग 90 सलाहाकार, खुफिया विश्लेषक, कमांडो और सहायोगी कर्मचारी शामिल हैं। विशेष बलों के अन्य चार दल अगले कुछ दिनों में पहुंच जाएंगे।
बगदाद स्थित दूतावास के भीतर और आसपास मौजूद अमेरिकी बलों के लगभग 360 सैनिकों की संख्या में वृद्धि हो जाने के बाद अब इराक में अमेंरिकी सेना की उपस्थिति लगभग 560 हो गई है। किर्बी ने यह भी कहा कि अमेरिका इराक पर रोजाना लगभग 35 निगरानी अभियान चला रहा है ताकि उत्तेजित और तेजी से बढ़ते उग्रवाद और इराकी सैनिकों के बीच चल रहे युद्ध की जमीनी हकीकत के बारे में खुफिया जानकारी उपलब्ध कराई जा सके। राष्ट्रपति ओबामा ने पिछले सप्ताह घोषणा की थी कि इराकी सुरक्षा बलों का आकलन करने के लिए और उन्हें सलाह देने के लिए लगभग 300 सलाहाकार भेजेगा। इस योजना के तहत बगदाद और उत्तरी इराक में एक-एक संयुक्त अभियान केंद्र स्थापित किया जाना है।
इस दल के अधिकतर सदस्य आर्मी ग्रीन बेरेट्स हैं, जो कि इराकी सैनिकों और उनके वरिष्ठ मुख्यालय कमांडरों की तैयारी का आकलन करेंगे। इससे वे पता लगाने की कोशिश करेंगे कि किस तरह अमेरिका सुरक्षा बल को मजबूत कर सकता है और कहां अतिरिक्त सलाहाकारों की जरूरत पड़ सकती है। किर्बी ने कहा कि दलों की ओर से शुरूआती आकलनों को अगले दो या तीन सप्ताहों में पूरा किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सैनिकों की इराक में मौजूदगी की कोई समय सीमा तय नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘मेरे पास आपको बताने के लिए कोई समयसीमा या अंतिम तिथि नहीं है लेकिन यह बिल्कुल साफ है कि यह सीमित ही होगा। यह एक अल्पकालिक अभियान होगा।’’ उन्होंने कहा कि उग्रवाद बेहद व्यवस्थित है और इसे विदेशी लड़ाकों एवं देश में मौजूद सुन्नी समर्थकों से मदद प्राप्त है। मंगलवार को सीनेटरों के साथ की गई बैठक की अध्यक्षता मध्यपूर्व में शीर्ष अमेरिकी राजनयिक एने पेटरसन ने की थी। इस बैठक में सैन्य और खुफिया अधिकारी भी मौजूद थे।


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