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3 मई 2014

विश्व प्रेस दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
                                                मौजूदा समय में पत्रकारिता की कसौटी
बालकृष्ण मिश्र :-
मुझे ऐसे किसी भूतकाल के पत्रकारिता के सम्बन्ध में कुछ भी जानकारी नही है । वेद पुराणों या अन्य ग्रंथों में इसके सम्बन्ध में कोई चर्चा है भी या नही ,मुझे कुछ भी ज्ञात नही है । मैं युग धर्मी पत्रकार हूँ ,और वह भी ऐसा वैसा नही नामी –ग्रामी तथाकथित बड़े लोग मुझे देखते ही सहम जाते हैं ,अधिकारी डर जाते हैं और कितने तो मुझे देखते जीते-जीते मर भी जाते हैं। मेरा एक रुतबा है रास्ते चलते साहबों की गाड़ियाँ रुक जाती हैं । राजनेताओं की गाड़ियाँ तो मैं घर पर न भी रहू तो भी मेरे दरवाजे से जरुर गुजरती जाती हैं । जाहिर है कि छोटे बड़े हाकिम -हुक्काम राजनेता मेरे दरवाजे की धूल चाटते हैं तो मैं कतई जन सामान्य व्यक्ति नही हूँ । इतने बड़े से बड़े यहाँ तक कि दिग्गज लोग मुझसे सशंकित रहते हैं तो निश्चय ही मेरी कोई खास पहचान है । इस तरफ भी आपका ध्यान थोड़ा दिल देना चाहता हूँ क्योंकि अक्सर लोग पत्रकार बनने की दिलासा रखते हैं तो पूछ देते हैं भईया पत्रकार बनने की कौन सी योग्यता अपेक्षित है । मैं तो निसंदेह संकोच में पड़ जाता हूँ की ऍमजेंऍमसी कहूँ या बीजेएमसी या इससे कुछ अधिक या कम ,कुछ भी समझ में नही आता की कैसे उन्हें बताऊं ,लोगो को मना कर देता हूँ ,रहने दो भाई मत पूछो । फिर भी लोग पूछने से बाज नही आते । इससे यही लगता है कि मुझमें पत्रकारिता का जो गुण है उसी के बदौलत लोग पूछते हैं तो क्यों न मैं अपने गुणों को ही लिख दूं| लोग पत्रकार की योग्यता समझ लेंगे और तब बार-बार पूछने की मार से मैं वंचित हो जाऊंगा| मैंने पहले ही बता दिया है की मैं युग धर्मी पत्रकार हूँ । मैंने पत्रकारिता के लिए कुछ नियम बना लिया है। 
मैंने सर्वप्रथम कुछ प्रसंशा की और कुछ निंदा की पंक्तिया याद कर लिया है । देश ,काल ,ज्ञान ,भूत ,भविष्य कुछ की जानकारी नही। राजनीति का ककहरा भी नही जानता पर युग धर्मी बुद्धि से यह जानता ही नही यह मानकर चलता हूँ कि प्रधानमंत्री और जिले के न्यायधीश और कुछ हद तक पुलिस अधीक्षक की प्रशस्तियाँ लिखता रहूँ तो मैं सम्प्रति उन तमाम पत्रकारों को पीछे छोड़ दूंगा जो देश काल एवं देश की भीतरी खतरों से भली-भातिं वाकिफ हैं । कई बार तो मैंने पुलिस अधीक्षक के पैर में खरोंच लगने को उन्हें मुठभेड़ करते दिखाकर काफी इज्जत प्राप्त की । एक बार मनमोहन सिंह की प्रसंशा क्या कर दिया सारे कर्मचारी तथा मंत्रीगण भी मेरी लेखनी के कायल हो गये ।अब मेरे समाचार की सुर्खियाँ बढती जा रही है ,कई अधिकारिओं ने गाहे- बगाहे अपनी गाड़ियाँ भी कहीं आने जाने के लिए देना प्रारम्भ कर दिया है ,अब मैं किसी भी समाचार को सीधे प्रेस लेकर पहुच जाता हूँ |वहां कुछ आव-भगत करनी पड़ती है पर इतने से ही अन्य सभी वरिष्ट पत्रकार भी पीछे छुट जाते हैं | अब अब मुझे कोई धमकाता तक नही ,मुझे देख कर सभी पत्रकार जलते हैं ,पर मुझे उनकी तनिक भी परवाह नही | कुल मिलाकर मैं बखूबी जानता हूँ की अच्छे लोग मुझे गली देते हैं भला बुरा सब बक देते हैं पर मेरे सामने नही, अन्यत्र | अब अख़बार एक पेशा हो गया है ,इसके बल पर मैं अच्छे- अच्छे अधिकारियों को पटा लेता हूँ ,कुछ उनका नाम होता है कुछ अपना काम भी | 
देश दुनिया की समस्या में उलझना नही चाहता हूँ | और उलझूं भी क्यों ? दुनिया स्वार्थी है मै भी इसी दुनिया में रहता हूँ | मुझे मालूम है पत्रकार बनने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़े, उस समय मेरी सहायता किसी ने नही की ,भला हो उस संपादक का जिसने किसी ‘कीमत’ पर अपने पत्र का संवादी बना लिया ,रूपए पैसा तो सभी मांगते हैं ,उन्होंने ने भी लिया लेकिन काम तो कर दिया ,कितने तो पैसे फेंकर अभी भी लटके हुए हैं | पैसा दे देने पर काम जल्दी से हो जाये तो मैं इसे बुरा नही मानता ,न हो उसे बुरा मानता हूँ |
इसलिए जो लोग सम्प्रति पत्रकार की योग्यता पूछते हैं उन्हें मैं,साधन , शिक्षा ,आदर्श को बेकार बताता हूँ, पत्रकार बनने के लिए अब आपको बनने की जरुरत नही है ,संपादक को बनाने की जरुरत है | आज जब भी कोई पत्रकार मुझसे यह कहता है की यार सम्प्रति पत्रकारों की दशा देखकर मैं हतप्रभ हो गया हूँ ,एक तरफ अपना देश नाजुक दौर से गुजर रहा है भीषण से भीषण समस्याएं मुह बाये खंडी हैं ,दूसरी तरफ हमारा पूरा पत्रकार मंडल नशे में धुत है ,वह समस्याओं को उजागर क्या करेगा |उसका समाधान कैसे निकालेगा ,वह खुद एक राष्ट्रीय समस्या बन गया है | तो उन्हें मैं समझाता हूँ की आप सब मेरे समान युग धर्मी पत्रकार बनिए |युग को झूठलाकर कोई जीवित नही रह सकता ,अगर देश नाजुक दौर से गुजर रहा है तो उसकी कमजोरी से जितना हो सके लाभ उठाईये ,जिस तरह बनिया का कोई कोई अपना देश नही होता ,उसी प्रकार पत्रकार को भी होनी चाहिए | सही मायने में युग धर्मी पत्रकार बनिए | 
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