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किसानों का 'हल'- चौधरी चरण सिंह


ह्रितिक जोशी :    मौजूदा सदी वाले भारत में कोई असहाय ग़रीब व सरकारी योजनाओं से 'अछूत' किसानों का जुबानी ज़िक्र किए बिना नेता (तथाकथित लोगों का "लीडर") बना हैं क्या? उम्मीदों का ठीकरा तो तब फूटता हैं, जब किसानों का केवल ज़िक्र ही होता हैं। क्या करे? नाउम्मीदियों का दौर हैं, झेलना ही पड़ेगा। मगर एक ज़माना ऐसा भी था जब ऐसी  नाउम्मीदियाँ एक विचारधारा के चरणों तले रुल जाती थी।उस  विचारधारा का नाम था- 'चौधरी चरण सिंह'| आप इसी पल लिखावट पर बिखरें हुए इन शब्दों को और अपनी समझ को एक साथ संजोइए  और मेरे साथ इस आलेख के अंत (नीचे) तक चलिए क्यूँकि कुछ क्षणों तक उस शख़्स का मुआयना करेंगे, जिनके लिए मैं अपनी कलम उठाने पर मज़बूर हो गया।
चौधरी चरण सिंह सिर्फ़ एक राजनीतिज्ञ, एक किसान नेता, एक पार्टी के अध्यक्ष और एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री का नाम ही नहीं था, चरण सिंह एक विचारधारा का भी नाम था। चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर, 1902 को ग़ाज़ियाबाद जनपद के नूरपुर गाँव (ब्रिटिश भारत) में हुआ था।  चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता रूप में विख्यात थे। किसानों की ढाल बनकर उनके हक़ों के लड़ने के लिए नीतियों का निर्माण करने वाले वह इकलौते राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक [नाबार्ड] की स्थापना की। वह धर्म और जाति की राजनीति के धुर विरोधी थे। अगरा विश्वविद्यालय से क़ानून की शिक्षा लेकर 1928 में चौधरी जी ने ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा पूर्वक ग़ाज़ियाबाद में वकालत प्रारंभ की, जिसके चलते वह व्यावसायिक तौर पर वकालत जैसे पेशे से जुड़े। 
राजनीतिक सफ़र :
स्वाधीनता के समय ग़ाज़ियाबाद से आंदोलन की जड़े बुनते हुए चौधरी चरण सिंह ने राजनीति में अपने पैर जमाए और राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान वो महात्मा गाँधी और कांग्रेस की मिट्टी में तपे. 1937 से लेकर 1977 तक वो छपरौली - बागपत क्षेत्र से लगातार विधायक रहे और 1930 में महात्मा गाँधी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत् नमक कानून तोडने का आह्वान किया गया। गाँधी जी ने ‘‘डांडी मार्च‘‘ किया। आजादी के दीवाने चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा पर बहने वाली हिण्डन नदी पर नमक बनाया। परिणामस्वरूप चरण सिंह को 6 माह की सजा हुई। मगर लगातार 40 सालों तक कांग्रेस पार्टी का सदस्य रहने के बाद उन्होंने 1967 में पार्टी से इस्तीफ़ा दिया और कांग्रेस पार्टी छोड़ दी।दो दिन बाद चौधरी साहब ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पहली ग़ैर कांग्रेस सरकार बनी। इसी के उपरांत एक साल बाद भारतीय क्रांति दल का गठन किया था। उनकी विरासत कई जगह बंटी। आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल , अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं। चौधरी चरण सिंह सादा जीवन की नौका पर शुरू से ही सवार थे। वह प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हवाई यात्रा को छोड़ 'ट्रेन' से यात्रा करते थे। 'सिंपल' शब्दों में कहूँ, तो हाथ में साधारण "एचएमटी" की घड़ी बाँधते थे, वह भी उल्टी। आजकल के उत्सुक राजनेताओं की सादगी पर मुझे कभी-कभी संदेह होता हैं न कि आसमान में पच्चीस-पच्चीस 'हेलिकॉप्टर' में सफ़र कर ग़रीबी पर भाषण देना सादगी हैं? याचारित्रिक रूप से ग़रीबी दर्शाना सादगी हैं।
 चौधरी चरण सिंह की सादगी का स्मरण करते हुए, अमूमन सभी लोग इस बुनियादी तर्क पर अमल करते हैं कि चौधरी चरण सिंह उन महापुरुषों की शृंखला में शामिल हैं, जिन्होंने 'न्यूनतम लिया और अधिकतम दिया'। 

~ऋतिक जोशी, ग़ाज़ियाबाद (उ॰ प्र॰)

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