आयुषी बिष्ट/दिल्ली : जब भी उत्तराखंड में कोई त्रासदी या फिर उसकी आशंका पैदा होती है तो हमेशा की तरह फिर वही सवाल हमें चिंता में डालता है कि इस पहाड़ी इलाके का विकास आखिर किस तरह से हो रहा है? क्या हमने पिछली त्रसिदियों से कुछ सबक लिया है? इसका उत्तर अक्सर हमें 'ना' में ही मिलता है। केदारनाथ त्रासदी के बाद जिस तरह से केदारनाथ घाटी में पुनर्निर्माण हुआ है वह आंख खोलने के लिए काफी है। उत्तराखंड राज्य को बने 19 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान कांग्रेस और भाजपा के शासन में इस राज्य ने 8 मुख्यमंत्री देखे और इस लिहाज से यह कहना गलत नही होगा कि इनके कार्यकाल में किसी और चीज का रिकॉर्ड भले ही ना बना हो लेकिन भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड जरूर बना है। उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए जब लोगों ने आंदोलन किया तो इसके पीछे लोगों की आकांक्षा यही थी कि जब यह राज्य बनेगा तो उसका विकास यहां की स्थानीय जरूरत तथा भौगोलिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक विशेषताओं को ध्यान में रखकर होगा। लेकिन इन 19 वर्षों में हमने यही देखा है कि यहां की सरकार के पास इस पहाड़ी राज्य के विकास का कोई रोड मैप नही है, बल्कि यहां का विकास बिल्कुल उसी पाटन पर किया जा रहा है जैसा मैदानी इलाकों का होता है। पर्यावरण परिस्थिति और संस्कृति तीनों कि आज सबसे खतरे में है। अगर पूरे क्षेत्र पर एक सरसरी निगाह डालें तो आप पाएंगे कि उत्तराखंड एकमात्र ऐसा राज्य है जहां से सबसे ज्यादा पलायन हुआ है और लगातार जारी है। अगर आप हिमाचल प्रदेश को देखें तो वहां उत्तराखंड के मुताबिक पलायन बहुत कम हुआ है इसका मुख्य कारण यह है कि वहां बागवानी , फूलों की खेती सीजन की सब्जियों का उत्पादन लघु और कुटीर उद्योगों की वजह से ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी मजबूत है और इसमें लोगों को गांव में ही रोकने का काम किया है लेकिन वही उत्तराखंड में विकास की गंगा एकदम उल्टी बह रही है। उत्तराखंड में गांव खाली हो रहे हैं। ऐसे गांवों के लिए इन दिनों एक शब्द काफी प्रचलित हो चला है- 'भूतिया गांव'। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भूतिया गांव - जहां से पूरी आबादी पलायन कर चुकी है। पिछले दस सालों में करीब 01 लाख 19 हजार लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। उत्तराखंड जैसे छोटे से राज्य के लिए यह संख्या कोई मामूली संख्या नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 से 2017 के बीच पलायन आयोग ने पाया कि 734 गांव से पूरी की पूरी आबादी ही पलायन कर चुकी है और 465 गांव से 50 फ़ीसदी से भी कम आबादी रह गई है। पलायन आयोग के अध्यक्ष ने एक रिपोर्ट में बताया कि यह बहुत ही चौकाने वाला है कि बहुत लोगों ने अपना गांव इसिलए छोड़ दिया क्योंकि वहां मूलभूत सुविधाएं तक नहीं थी। इसमें से कई गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब है जो कि बहुत ही चिंता की बात है। यह तो सरकारी आंकड़े हैं लेकिन गैर सरकारी आंकड़े के हिसाब से गांव की संख्या तकरीबन 3000 है जो पलायन से पूरी तरह प्रभावित हुए हैं। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में रोजगार के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं का तो बहुत ही बुरा हाल है। वर्ष 2001 में हुई जनगणना में उत्तराखंड के पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों की आबादी कम हुई है। यह दो ऐसे जिले हैं जहां से सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। उत्तराखंड में दो तरह का पलायन हो रहा है एक उत्तराखंड से बाहर जाने का , जिसका प्रतिशत काफी ज्यादा है, दूसरा उत्तराखंड के भीतर जिनका प्रतिशत कम है। इससे हुआ यह है कि उत्तराखंड के मैदानी इलाको में आबादी बढ़ी है। भविष्य में इसका इस पहाड़ी राज्य पर जिस तरह का असर पड़ने वाला है वे काफी चिंताजनक हो सकता है और तब इन पर्यावरण परिस्थिति और संस्कृति से जुड़े सवालों का कोई मतलब नहीं होगा। अभी जो नीतियां पहाड़ को खोखला कर रही है भविष्य में इसकी रफ्तार और तेज होगी आने वाले 20 से 25 साल बाद इस मध्य हिमालय राज्य की पहाड़ी संस्कृति एक इतिहास बन जाएगी। इससे दुःखद यह है कि इस राज्य में अब तक जितनी भी सरकार रही है उसने पहाड़ की जरूरत के हिसाब से कभी नीतियां नहीं बनाईं। अगर बनी होती तो कम से कम इतने बड़े पैमाने पर पलायन नहीं होता। पहाड़ खनन माफिया, जंगल माफिया, शराब माफिया, रियल एस्टेट माफिया के लिए एक ऐसा चारागाह बन गया है जहां उसकी ताकत के हिसाब से जो चाहे जितना लूट ले। अब पहाड़ की नदियों को देखें आपको खुद ही समझ में आ जाएगा कि रेत बजरी माफिया ने इस नदी को किस तरह मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है। पहाड़ी कस्बे स्लम में तब्दील होते जा रहे हैं। जहां पर्यटक आते हैं वहां बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगल उग गए हैं बाकी काम बड़े पैमाने पर बन रहे बांध पूरा कर रहे हैं। कुल मिलाकर उत्तराखंड अधूर दर्शी विकास नीतियों के ऐसे पहाड़ पर खड़ा है जिसका ढहना लाजमी है। दुःखद यह है कि विनाश को मुहाने पर पहुंचा दिए गए उत्तराखंड की ना तो सरकारों को कोई चिंता है और ना ही उत्तराखंड के लोगों को। प्रवासी उत्तराखंडयों के लिए पहाड़ का मतलब एक "नॉस्टैल्जिया" बन गया है और वे इसी में खुश है। मेरा सुंदर पहाड़ उसके सरोकार उतने ही दिखावटी है जितनी पहाड़ की विकास नीतियां।
सिद्ध भूमि न्यूज़ नेटवर्क:: शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय का 59वाँ वार्षिकोत्सव 29 जून 2020 को आयोजित किया गया। कोरोना संक्रमण के बढ़ते खतरे को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष यह समारोह ऑनलाइन माध्यम के द्वारा संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रगान और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में रॉय फाउंडेशन के संस्थापक श्री संजीव रॉय आमंत्रित थे। उन्होंने इस अकादमिक सत्र के पुरस्कृत सभी छात्रों को अपनी शुभकामनाएं देते हुए कहा - “कोरोना के इस संकटग्रस्त अनिश्चित दौर में हमें अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा। अपनी अंतर्निहित क्षमताओं द्वारा नये अवसरों का सृजन करना होगा। उन्होंने कहा कि वो यंग इंडिया में नई संभावनाओं को देखते हैं। जब यंग इंडिया की बात होती है, तब पूरा भारत इस देश के युवाओं की ओर हसरत भरी निगाहों से देखता है।" इस अवसर पर शिवाजी कॉलेज के पूर्व छात्र और दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एन. हरिहरन ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि “ हमें भविष्य की संभावनाओं के प्रति अपने दिलो दिमाग को खुला रखना चाहिए। अपने कॉलेज के दिनों की स्...
