ऋषभ अग्रवाल ,वंशिका सक्सेना,चंदन कुमार: "खींचों न कमानों को,न तलवार निकालों, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो" ये पंक्तियां पत्रकारिता के प्रभाव को आज भी इंगित करता है । पत्रकारिता जन-जन तक सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन परोसने की विधा है। इंदिरा गांधी का कहना था कि पत्रकारिता जनसेवा है, इसका परम लक्ष्य,ख़बरों को एकत्र करना,उन्हें छापना, प्रसारित करना ,लोगों को अधिक से अधिक जानकारी देकर उन्हें अच्छे तरीके से जांच और निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है।जाने माने पत्रकार प्रभास जोशी मानते थे कि 'कार्यपालिका, न्यापालिका, विधायिका और प्रेस में यदि पत्रकार चौथा खंभा है तो पत्रकार होने के नाते उसका अधिकार और कर्तव्य है कि वो तीनों खंभो पर पैनी नज़र रखे | ।पत्रकार या पत्रकारिता को समाज का दर्पण कहा जाता है ,चूंकि ऐसा माना जाता है कि पत्रकार समाज के विकृत अंगों को उजागर करता है साथ ही साथ समाज की भलाई के लिए महती भूमिका निभाता है | । भारत पत्रकारिता का हस्तिनापुर माना जाता रहा है। लेकिन आज हस्तिनापुर का सिंघासन खतरे में है | आज का दिन हम हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते है क्योंकि आज ही के दिन 1826 में पंडित युगल किशोर शुक्ल ने पहला हिंदी समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड ' प्रकाशित किया था।उस समय अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला में तो अनेक पत्र निकलते थे, किन्तु हिन्दी में कोई समाचार पत्र नहीं निकलता था। इस पत्र के 79 अंक ही प्रकाशित हो पाए। करीब डेढ़ साल बाद ही दिसंबर 1827 में इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा। उदन्त मार्तण्ड के अंतिम अंक में पंडित जुगल किशोर शुक्ला ने बड़े मार्मिक ढंग से लिखते हुए कहा था-
"आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त
अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त।"
कमोबेश आज भी स्थितियां वैसी ही बन रही हैं उस समय बिना किसी मदद के अखबार निकालना लगभग मुश्किल ही था, अत: आर्थिक अभावों के कारण यह पत्र अपने प्रकाशन को नियमित नहीं रख सका। कभी पत्रकारिता को मिशन के रूप में लेकर चलने वाला भारत आज दिवालिया हुआ पड़ा है। आज भारत 2020 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों की सूची में 142 अंक पर नज़र आता है इससे स्पष्ट संकेत मिल रहा हैं कि कहीं न कहीं चौथे खंभे का अस्तित्व खतरे में है पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने के खातिर अपने प्राणों की आहुति देने वाले देश में अब पत्रकार राजनेताओं और पूंजीपतियों को दंडवत देते नजर आते है। अभी के समय में पत्रकारिता का क्षेत्र व्यापक और भटकाऊ हो गया है। ख़बर दिखाने की होड़ में वास्तविक मुद्दा कही दम तोड़ रहा होता है । नीली पीली पत्रकारिता से आजकल लोग अपने गुलाबी मंसूबो को कामयाब कर रहे है।आज जब आप ख़बर देखने की खोज में निकलेंगे तब आपको प्रायोजित खबरें और धार्मिक असंतुलित वातवरण देखने को मिलेगा । आज के समय में पत्रकारिता के भीष्म पितामह 'गणेश शंकर विद्यार्थी का कथन प्रासंगिक है। उन्होंने कहा था कि 'मैं हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े की मूल वजह चुनाव को समझता हूँ ,चुने जाने के बाद राजनेता देश और जनता के काम का नही रहता। धर्म निरपेक्षता की बात करने वाला ये मूर्धन्य पत्रकार भी 1931 में दंगों के हत्थे चढ़ जाता है और उनकी मृत्यु हो जाती है । ऐसा लगता है जैसे भारत कभी पत्रकारिता के स्वर्णिम दौर का साक्षी नही बन सका है ।
