हिमांशु सिंह-औरंगाबाद, बिहार:- मजदूर हुँ साहब जब भी घर लौटा, साथ लेकर आया पिता के लिए धोती,माँ के लिए साड़ी, पत्नी के लिए रॉलगोल्ड की चूड़ियाँ, बहन के लिए मोती वाला सलवार सूट,बेटे के लिए चाबी वाला मोटर गाड़ी, नई कमीज व बुशर्ट,बेटी के लिए गुड़ियां व झालर वाला फ्रॉक, भाई के लिए रेंजर साइकिल के रुपए, भाई के लिए सीरियल में दिखने वाली साड़ियां, पास-पड़ोस के लिए छेना की मिठाईया।...पर इस बारी उसका सारा अरमान टूट गया व लेकर इस दफ़े ये सब कुछ नही लाया।लाया तो आँखों मे बेहिसाब आँसू, पाव में छाले, भूख व प्यास से बिभोर हुए ओठ, धूल से भरा हुआ चेहरा और भी बहुत कुछ,आया भी तो खुद को समान के गठरी के भाँति ट्रक में लदकर आया,खून से लथपथ पाँव से सड़क को पेंट कर आया,साइकिल पर बैठ भूख से बेहाल जीवन व मौत की धुरी पर पैंडल मार आया।और हर पैंडल के साथ सोच रहा था कि देशहित के सम्मान में कुछ करने को मौका मिला हैं और अब सरकार भी यही चाहती है कि हम आत्मनिर्भर बने |
क्या सरकार यही आत्मनिर्भरता चाहती हैं ! ? क्या सरकार के खजाने में गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है ? इस 20 लाख करोड़ के लॉलीपाप में मजदूरों के लिए कुछ नही है साहब। ये हाथी जैसा विशालकाय मजदूर समाज मे चूहे के भांति ट्रेन चलाकर ऊँट के मुँह में जीरे वाले कहावत का साक्षात्कार कर रही है। अगर अभी चुनावी माहौल होता तो सरकार से जुड़े लोग अपनी गाड़ी भी मजदूरों को घर छोड़ने में लगा देते ! ख़ैर अभी तो चुनाव में काफी समय है ।