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वीरता थी उसमें कूट कूट, वह था भारत का समर्पित पूत "सावरकर"

वंशिका सक्सेना :    28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास छोटे से गांव भागूर में इस क्रांतिकारी का जन्म हुआ था| इनके पिता का नाम दामोदर सावरकर और माता का नाम राधाबाई था| उस समय भारत पर अंग्रेजों का पूरी तरह से कब्जा था| ऐसा कहा जाता है की बचपन से ही इनकी मां इन्हें महाभारत, रामायण, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह जी की प्रसिद्ध और साहस से भरपूर कहानियां सुनाती थीं| शायद यही कारण था कि सावरकर में बचपन से ही वीरता घर कर गई थी| सावरकर हमेशा से ही उत्तम श्रेणी के लेखक और श्रेष्ठ वक्ता थे| 1900 में मित्र मेले की शुरूआत इन्होंने ही की थी| इस मेले में भारतीय परंपरा के अनुसार मनाए जाने वाले सारे त्योहारों का आयोजन किया जाता था| शिवाजी फेस्टिवल, गोविंद जयंती से लेकर गणपति उत्सव तक सारे भारतीय संस्कृति से जुड़े त्योहारों को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता था| भारतीय संस्कृति से असीम प्रेम करने वाले सावरकर का मानना था कि इन सारे आयोजनों से भारतीयों में न सिर्फ एकजुटता बढ़ेगी बल्कि अपनी संस्कृति के बारे में लोग जानेंगे और साथ ही इस बात से भी अवगत होंगे कि भारत का इतिहास कितना बड़ा, दिलचस्प और प्रेरणा स्रोत है|
वीरता के साथ-साथ सावरकर में प्रतिभा भी कूट कूट कर भरी हुई थी| 1904 में सावरकर द्वारा अभिनव भारत की स्थापना होती है जिसका एकमात्र लक्ष्य भारत को स्वतंत्र करवाना और भारतीयों में स्वतंत्रता की चेतना जगाकर एकजुट करना था| वीर बीए की डिग्री लेने के पश्चात स्कॉलरशिप हासिल कर लंदन में कानून पढ़ने चले गए| वहां पर यह कई ऐसे लोगों के संपर्क में आए जो भारत की आजादी के लिए पुरजोर तरीके से संग्राम में शामिल होने की इच्छा रखते थे| वहीं पर इन्होंने इतिहास के पन्नों को खंगालना शुरू किया| 1857 की क्रांति को बड़ी गहराई और संजीदगी से जानने के पश्चात 1909 में "द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस" किताब लिखी जो कि एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी किताब साबित हुई| इस किताब ने ब्रिटिशर्स की सिपोय म्यूूूूटिनी थ्योरी को पूरी तरह से खारिज कर दिया था| इस किताब की छपने की भी एक दिलचस्प कहानी है| अंग्रेजों के राज में ऐसी पुस्तकें छापना तलवार की धार पर चलने जैसा काम था| लेकिन वीर ने इसका भी एक उपाय खोज लिया| उन्होंनेेेे इस पुस्तक की एक कॉपी अपनेेेे भाई बाबा राव, दूसरी कॉपी अपने एक मित्र और तीसरी कॉपी मैडम भीकाजी कामा को भेजी| अब यहां मैडम भीकाजी ने बड़ी चतुराई से सावरकर की बुक इस तरह से छपवाई कि किसी को किताब के क्रांतिकारी स्वभाव का पता ना लगे| उन्होंने कवर पेज पर कुछ रखा ही नहीं और दूसरे पेज को कवर पेज बना दिया| इसके बाद चोरी छुपे वितरण का सिलसिला शुरू हुआ| और जब लोगों तक यह किताब पहुंची तब लोग 1857 की क्रांति के अजर अमर इतिहास से जागरूक हुए जिसको ब्रिटिशर्स ने सिपोय म्यूटिनी यानी सिपाही विद्रोह कहकर चिताया था|
सावरकर की जिंदगी का सबसे बड़ा विवादास्पद मुद्दा गांधी जी की हत्या का इल्जाम था| गांधी जी की हत्या के बाद इन्हें निवारक निरोध यानी प्रीवेंटिव डिटेंशन में रखा गया था| हालांकि इनके खिलाफ कोई भी सबूत ना मिलने के कारण इन्हें रिहा कर दिया गया| ख़ैर गांधी जी की हत्या के विषय में सावरकर के नाम पर अक्सर वाद विवाद होता ही रहता है| लेकिन इस बात को प्रकाशित करना लाज़मी है कि वीर सावरकर के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं मिला था और यही वजह है कि शक के बिनाह पर इन्हें गिरफ्तार जरूर किया था लेकिन कोई सबूत ना मिलने के कारण बाइज्ज़त रिहा भी कर दिया गया था| 
सावरकर की पूरी जिंदगी ऐसे कई विवादों में घिरी थी| द फर्स्ट वॉर ऑफ 1857 के खुफिया वितरण के बाद अंग्रेजों को इस बात का डर था कि कहीं सावरकर उनके शासन मे बाधा ना बन जाएं| अंग्रेज गिद्ध की तरह घात लगाए बैठे ही थे कि 1909 में ही सावरकर केे एक सहयोगी मदनलाल ढींगरा ने करजन वायली को गोली मार दी| इसी हत्या के मौके का फायदा उठाते हुए अंग्रेजी सरकार ने सावरकर को गिरफ्तार कर भारत लाने का आदेश दिया| सावरकर को एक शिप से भारत ले जाया जा रहा था| इन्हें इस बात का पूरा आभास हो गया था कि भारत ले जाकर इनको सजा दी जाएगी और सबके मन में आजादी के जिस क्रांति के दीपक को इन्होंने जलाया था वह फिर से बुझ जाएगा| इसी विचार से असमंजस में घिरे सावरकर ने क्रांति की लौ को न बुझने देने की चेष्टा से शिप की एक खिड़की से कूद कर इस परिस्थिति से निकलना चाहा लेकिन दुर्भाग्यवश इन्हें पकड़ लिया गया| तत्पश्चात इन्हें 50 साल के आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई और 1911 में इन्हें धरती का नर्क माने जाने वाले सेल्यूलर जेल भेज दिया जाता है| वहांं पर इनकेे स्वास्थ्य को बिगाड़ने की पूरी कोशिश की गई और हर संभव प्रयास किया इनकी हिम्मत तोड़ने का| 
इन्हें पढ़ने लिखने का बहुत शौक था लेकिन जेल में इनके पास पेन और पेपर नहीं था| ऐसी स्थिति में इन्होंने अपने नाखूनों से जेल की दीवार पर वीर रस की कविताएं लिखी थीं| ऐसा समर्पण और देशभक्ति शायद ही आजकल कहीं देखने को मिलेगी| राजनेता राजनीति राजनीति खेलने में इस कदर गुम हो गए हैं कि कुछ पैसे उछाल कर अपने प्यादे छोड़ देते हैं| और ऐसी ही जनता बिना कुछ सोचे समझे उन असमाजिक तत्वों का बहिष्कार करने के बजाए अपने ही देश और देशवासियों को घायल करने में लग जाती है|
और एक थे वीर सावरकर, जिन्होंने 10 साल तक काला पानी की सजा का उत्पीड़न झेला| लेकिन उनका उद्देश्य हमेशा से आजाद भारत को अखंड देखना था| अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर वीर सावरकर जयंती का बड़ा शोर मचा हुआ था| सभी सावरकर के वीरता के किस्से और समर्पण की कहानियां सुनाने में व्यस्त थे| लेकिन किसी ने भी उन कहानियों से कुछ सीखने का कष्ट नहीं उठाया| और आगे भी यही सब होगा सरकार के किसी फैसले से रुष्ट होकर एक व्यक्ति के पीछे धीरे-धीरे 100 लोग हिंसा करने निकल जाएंगे| अपने ही हाथों से भारत की अखंडता का गला घोंटने लग जाएंगे| हम सभी को यह बात समझनी चाहिए कि इतिहास के पन्ने मात्र गौरव का पात्र नहीं होते| यदि इतिहास के पन्नों से देश भक्ति की खुशबू आती है तो वही पन्ने ऐसे कई वीर क्रांतिकारियों के खून से भी रंगे होते हैं|

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