ईश्वर चंद्र तिवारी:
गिरगिट तेरे कितने रंग?
पल में हरा, पल ही में नीला
पल-पल बदले अपने ढंग,
गिरगिट तेरे कितने रंग?
खुद ही तू यूँ जज बन जाते
बार-बार निज सिर को हिलाते,
पल-पल परिवर्तित कर हुलिया
बदलते रहते अपना संग,
गिरगिट तेरे कितने रंग?
मीन मेख तुमको बहु आता
ऊंची टहनी पर चढ़ जाता,
जहां फायदा रंग बदलता
ईर्ष्या से तू हर पल जलता,
लगता चिंता से आतुर है
स्वयं के करतब से ही तंग
गिरगिट तेरे कितने रंग?
सबको तू दोषी ही आंके
क्यों ना अपने में तू झांके,
कितना है लंबा इतिहास
बुझी नहीं है तेरी प्यास,
चंचल चितवन हाय तुम्हारी
उतनी भी करनी बेढंग,
हाय रे गिरगिट कितने रंग?
